अबला नहीं वह सबला है

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अबला नहीं वह सबला है नारी
ही शक्ति का रूप कहलाती है

कभी काली कभी चंडी
कभी सती बन जाती है

अपने हक को पाने रणभूमि
में ले तलवार उतर जाती है

वीरांगना का कवच पहने
दुश्मन के छक्के छुड़ाती है।

हर मोड़ पर विरागना बन
खड़ी हर रूप में मुस्कुराती है

अकेले ही अपना सफ़र
तय करती नजर आती है

वन में रहकर मजदूरी करें
पत्थर तोड़ती नजर आती है

पर्वतों के शिखर पर चढ़ देश
का नाम रोशन कर जाती है

कलम चलाने से लेकर
प्लेन भी वह उड़ाती है

मां बन के दुलार देती पत्नी बन
हर सुख दुख में साथ निभाती है

प्रेमिका बन जीवन को
निखार देती नजर आती है

बेटी बन हर दर्द को समझती स्नेह
का मरहम लगाती नजर आती है

अबला नहीं वह सबला है नारी
एक है कई रूप में नजर आती है

कभी पति के प्राण मांग
देवो से हट कर जाती है

अपने बच्चों की जिंदगी के खातिर
अपनी उमर देती नजर आती है

कोमल ह्रदय है नारी कभी
कठोर भी बन जाती है

अपने अधिकार पाने को हर
संकट से टकरा जाती है

अबला नहीं वह सबला है नारी
कई रूपों में नजर आती है

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About सरिता अजय साकल्ले 28 Articles
श्रीमती सरिता अजय जी साकल्ले इंदौर मध्य प्रदेश
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