और शाम ढल दी

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और शाम ढल दी….
जी भर निहारा न था,
और घड़ियां चल दी।
नैनों से नैन भी न मिल पायें,
और रश्मियाँ चल दी।

किरणें ज्यों-ज्यों ठंडी हो चली,
समय की कमी खल दी।
उन्हें छूकर होने का यकीन भी न किया,
और बिछड़ने की बातें चल दी।

बतियाये भी न जी भर के,
और कैसे सुबह चल दी।
नदिया को मिलने सागर आया था,
और नदिया शरमा के चल दी।

दिल चाहता था जी भर प्यार करना,
आंखों से भी न छुआ
और शाम ढल दी…
और शाम ढल दी…

विनीता बर्वे

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About विनीता बर्वे 5 Articles
विनीता विशाल बर्वे बीएससी बायोलॉजी, एम ए अंग्रेजी साहित्य, लेखन और सांस्कृतिक,सामाजिक ,धार्मिक कार्यक्रमो में क्रियाशील पतंजलि प्रमाणित योग शिक्षक धरमपुरी, मध्य प्रदेश
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