जिद एक बेटी की

एक छोटी सी बच्ची थी,
जिद करती थी खिलौने की,

जिद्द थी नई किताब की।
जिद कभी जूते चप्पल की,
जिद थी नए कपड़ों की।
जिद कभी हलवे की,

नहीं भाती रोटी अचार ।
चाहिए थे दाल चावल गरम,
फिर वो बड़ी हो गई ।
अब जिद नहीं करती ,

सुना कि उसे दूसरे घर जाना है
वहा जिद नहीं चलती,
वहा जैसा मिलेगा खाना होगा ।
उनके इच्छा से रहना होगा

जैसा कहेंगे करना होगा,
सबको खिलाके खाना होगा।
सबको सुला के सोना होगा,
तेरा कोई सपना ना होगा।

अब वो पराई हो गई ,
अब कुछ नहीं चाहिए उसे ।
कोई जिद बाकी नहीं है अब,
अब जिद नहीं जिम्मेदारी है।

Photo by Kelly Sikkema on Unsplash

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About सुषमा चौरे 7 Articles
मैं सुषमा चौरे इंदौर से, शिक्षा राजनीति शास्त्र में एम ए किया है। देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी से योग डिप्लोमा । 25 साल शिक्षण कार्य किया है। साहित्य में रुचि है पढ़ने और लिखने का शौक है। नियम नहीं जानती को मन में आता है लिख लेती हूं।
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