धूप कभी छांव

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जिंदगी का पथ है बड़ा निराला
कभी धूप कभी छांव। वाला

सुख दुख दो पंथ पर चलता
है यह जिंदगी का रथ निराला

कभी अपने कभी पराए दे जाते
हैं अनमोल पल इस मन को

कभी शब्दों के घाव दे जाते
हैं अपने पराए इस तन को

कभी मन को मीत मिले
कभी तन को टीस मिले

जिंदगी की नैया कभी भवर
में कभी मझधार में चले

आखिर में किनारे लगे चले
राही अपने-अपने पंथ को

कभी धूप कभी छांव लिए
यह जीवन कट जाता है

संघर्ष की राह चलते राही
अपनी मंजिल को पा जाता है

प्रकृति ने हमें यह सिखाया है
रात के बाद दिन नजर आया है

पतझड़ के बाद सावन उसके बाद
किसान लहराते खेत देख पाया है

सुख दुख धूप छांव में ही
जीवन गुजारा जाता है

दुख ही सुख का अहसास
इंसान को कराता है

धूप छांव में इंसान अपना
जीवन बसर कर जाता है

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About सरिता अजय साकल्ले 28 Articles
श्रीमती सरिता अजय जी साकल्ले इंदौर मध्य प्रदेश
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