निर्झरणी

ganges

उतुंग पर्वत शिखरों से हो प्रस्फुटित
उज्जवल जल धार बनकर धरा पर आती है
बूंद,बूंद कर संग्रहित निर्झरणी वो बन जाती है ।

कहीं उन्मुक्त नव यौवना सी वह अठखेलियाँ करती जाती है
कल, कल बहती वह हमें , जल तरंग सुनाती है ।

कभी पर्वतों को चीर कर तो कभी सुरंगों में भी बहती जाती है
दो तटों के बीच बहकर वह तटिनी भी कहलाती है ।

हरा भरा करती खेतों को जीवनदायिनी कहलाती है
स्वच्छ जल का पान करा सबको वो सुजला कहलाती है।

जीवन का पालन – पोषण कर पुण्य सलिला कहलाती है
कठिन संघर्ष कर ये अविरल बहती जाती है।

पतित पावनी हमारी नदियां
दर्शन मात्र से ही जीवन का उद्धार कर जाती हैं ।

Photo by Roxanne Shewchuk from Pexels

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About जागृति डोंगरे 11 Articles
मैं जागृति श्यामविलास डोंगरे मंडलेश्वर से . पिता --- महादेव प्रसाद चतुर्वेदी माध्या (साहित्यकार) हिन्दी, अंग्रेजी, निमाड़ी मंडलेश्वर शिक्षा --- M. A. हिन्दी साहित्य मैं स्कूल समय से कविताएं लिखती रही हूं , काफी लम्बे समय से लेखन कार्य छूट गया था, अब पुनः शुरू कर दिया । इसके अलावा अच्छी,अच्छी किताबें पढ़ना , कुकिंग का भी शौक है। रंगोली बनाना अच्छा लगता है। कढ़ाई , बुनाई भी बहुत की,अब नहीं करती।
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Megha Billore
Megha Billore
10 months ago

सुन्दर कविता नदियों और उनके महत्त्व का वर्णन के साथ ।