स्वान्तः सुखाय

आँखों के संमदर में सुनहरा
अतीत डूब गया
साथ ही खो गए
अनमोल रत्न –
गिलहरी-सा बचपन
माँ का आँचल
बाबूल का लाड़
बहन का प्यार
भाई का दुलार
खो गई सखियाँ सारी
सूने हो गए स्वप्निल स्वप्न
खो गई मासूमियत
सुनो ! प्रिय
मैं जानती हूँ कि
तुम सदैव मुझे
जीवन पथ पर
उन्नति करते हुए
देखकर हर्षित हो जाते हो
परंतु मेरी उन्नति का
‘परिमाण ‘
भी तो तुम्ही ने बनाया है
बस मुझे उसी
रेखा में रहकर
अपनी उन्नति की राहें खोजनी है
जिस आँगन में मेरे
‘अल्हड़ बालपन ‘ का
मधुर कलरव गुंजित हुआ था…
‘बालपन ‘ आहा !
गायों के रंभाने के साथ
चिलचिलाती धूप में
कल्पवृक्ष की घनी शीतल
छाया-सा सुंदर बचपन ।।
आज उस आँगन
में खड़ा
वह विशाल छायादार वृक्ष
जिसकी टहनी थी
‘मैं ‘ कभी
बाट जोहता हैं मेरी
और जड़े स्तब्धता से
निभा रही
आज भी अपने कर्तव्य को
तुम दोनों के बीच में
खड़ी ‘मैं’
स्वयं को कश्मीर समझने लगी हूँ
जिसका एक खण्ड सरहद के उस पार
और दूसरा , स्वयं का
‘अस्तित्व’ खोज रहा है
सूनो ! प्रिय
कभी-कभी मुझे
खुद में 1947 के पूर्व का
भारत नज़र आता है
1947 के पूर्व का भारत
हा । हा हा ।
कहीं शब्दवंशी मुझे
विक्षिप्त ना समझ
बैठे ओह! कहीं मैं
‘बिशन सिंह ‘ तो नहीं
क्या था 1947 के पूर्व का भारत ?
पराधीन , पराश्रित परिंदा
विदेशी शक्तियों के पिंजरों में कैद
क्या मेरा जीवन भी यही है
मैं भी तो बंधनों में जकड़ी
‘औरत’ हूँ
‘औरत ‘ क्या है औरत ?
औ – औरों के लिए
र – रची गई
त – तस्वीर
‘असाध्य वीणा’ का
वह गीत
जिसे हर कोई अपनी
तरह से सुनना
चाहता है
(स्वान्तः सुखाय)
साधना चाहता है मुझे हर
बंधन ! बिना समर्पण के
कहीं मैं किरीटी तरू तो नहीं ?
जिसके विशाल कोटर
ने अपने भीतर
बसा रखा है
नया रहस्यमयी संसार
जिसमें है–
उन्मुक्त कल्पनाओं के घोड़े
धवल गहरे आसमानी रंग
का क्षितिज
मेखलाकार पर्वत श्रेणियों में
पावस ऋतु के बहते निर्झर
चातक , चकोर , कोकिल , सारंग
जैसे पक्षियों का मधुर कलरव
ऐसा प्रतीत होता है
कि शुभ्र-नीले गगन में
झिलमिलाते अनगिनत तारे
नीली-छत से
झनझनाते हुए
पृथ्वीतल पर गिर पड़े हो
सुनो ! प्रिय
आज शाम ढलते
सूरज को
और अधिक सूर्ख देखकर
सहसा ! मन भयभीत हो गया
हाथी के पैरों सी
स्मृतियों ने हृदय की
आर्द्र भूमि पर
छोड़ दिए हैं असंख्य चिह्न
दुर्बल मन के प्रतीक
आँसूओं में बहता , डूबता
‘अतीत ‘ सत्य है
असत्य है भविष्य की कल्पना
जो है वह वर्तमान है
यही है समय का खेल
अनगिनत सपनों से
बनती मिटती मुस्कान
और
इन सबसे जुझती
छोटी-सी जिंदगी
शब्दों से परे है
इसकी व्याख्या

Photo by Aziz Acharki on Unsplash

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About डॉ आरती वर्मा 'मुक्ति' 3 Articles
डॉ. आरती वर्मा 'मुक्ति' एम.ए, पीएच डी. , हिंदी शिक्षिका उपलब्धि - बेस्ट टीचर अवार्ड १९ जनवरी २०१९ रचनाएँ - मैं गांधारी नहीं, अनकहे से प्रश्न
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Rajan Mandlik
Rajan Mandlik
10 months ago

बहुत सुंदर स्वान्त:सुखाय, उत्तम शब्द चयन और बेहतरीन अभिव्यक्ति।

Rashmi sharma
Rashmi sharma
10 months ago

नारी के मन की व्यथा की अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर शब्दों के द्वारा

Sunil Chourey
Sunil Chourey
10 months ago

शब्दबोध बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है बहुत बधाई और शुभकामनाएं आप सदा इसी प्रकार नई-नई रचनाएँ प्रकाशित कर हमारा ज्ञान वर्धन कर सकते हो,,🙏🙏🙏