बाल मजदूरी

बाल

मन चंचल मन बावरा मन
समझ ना पाए
खेलने की उम्र में बालक बोझ ढोता
नजर आए
यह कैसी मजबूरी बचपन हाथों से
निकला जाए
कर में किताब की जगह बोझ ढोती
जिंदगी नजर आए
कैसी जगत कि रीत नीराली कोई खेले
खेल निराले
तो कोई सूने सेठ साहूकार रईसों
कि गाली
ऐसी मजबूरी दो रोटी तन को है
जरूरी
तन की भूख मिटाने मन मजबूर
हो जाता
खेलने की उम्र में बच्चा गेती हाथ में लिए
नजर आता
अंधा है कानून उन हाथों को इंसाफ
नहीं दिलाता
बाल मजदूरी बंद है फिर भी बालक कई
काम करता नजर
धन के बल पर शोषण होता हर जगह
नजर आता
खेलने की उम्र में बच्चा बोझ ढोता
नजर आता

Photo by Dylan Mullins on Unsplash

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About सरिता अजय साकल्ले 28 Articles
श्रीमती सरिता अजय जी साकल्ले इंदौर मध्य प्रदेश
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