करके श्रृंगार बिटिया चली ससुराल

बिटिया चली ससुराल

करके सोलह श्रृंगार मेरी
बिटिया चली है ससुराल
वह नन्हीं सी कली अब
फूल बन गई मेरी बगिया
छोड़ अपने चमन को चली

जहां भी जाएगी अपनी
महक से सबका दिल
लुभाएगी पतझड़ में भी
सावन का एहसास कराएगी

सब कुछ सह कर भी
सिर्फ वह मुस्कुराएगी
अपने गमों को कुछ
इस तरह छुपाएगी

मर्यादा का गहना मेरी
नन्हीं कली ने है पहना
उसे पहन वह दोनों
कुल की लाज बचाएगी

नन्हीं कली अब फूल बन
अपने चमन को महकाएगी
दुल्हन बन श्रृंगार कर चली
पिया के घर मेरी दहलीज वह
सुनी कर अपने कुल में जाएगी

अरमानों भरा दिल लिए
अपनी दहलीज में जा
सबका दिल लुभाएगी
नन्हीं कली अब फूल बनी
अपना चमन महकाएगी

सब को स्नेह की डोर में
बांधे स्तंभ बनती नजर
आएगी नन्हीं परी दुल्हन
बनी सब की आंखें भीगी
कर डोली में विदा हो जाएगी

मेरी बगिया छोड़ चली
मुझे बहुत याद आएगी
पल- पल मुझे खुशियां
देती उसकी सूरत हर
पल लुभाएगी की

रिश्तो की डोर मैं बंधी वह
कितना कुछ सह जाएगी
अपनों को छोड़ अजनबियों
के बीच अपना अस्तित्व रख
पाएगी मेरी नन्हीं कली फूल
बन अपना चमन महकाएगी

Photo by AMISH THAKKAR on Unsplash

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About सरिता अजय साकल्ले 28 Articles
श्रीमती सरिता अजय जी साकल्ले इंदौर मध्य प्रदेश
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