बसंत

बसंत

खिल उठी सूर्य किरण,
लाली लेकर जागी भोर।
बागिया में बोले पपिहा,
अमराई में नाच उठे मोर।

ओढ़ के दुशाला बासंती,
पवन चली लेकर मस्ती।
महक उठा जग ये सारा,
फूल खिले है बस्ती बस्ती।

सरित प्रवाह यू लहराए
अल्हड़ गौरी ज्यो झूमे गाए।
नव पल्लव खिले डाल डाल
टेसू फूलों से अगन भरमाए।

खेतो में पवन के झोंके से
फूली सरसों ऐसे लहराए।
धरा पहन कर पीला बाना
मदमाती हुई जैसे नाचे गाए।

अलि कलि को जब गीत सुनाते
वो मधुमय हो कर फूल खिलाती।
सृष्टि करती धरा को श्रृंगारित
तितली घूम घूम यहाँ रंग बिछाती।

प्रेम मय जग हो जाए बंसन्ती
राधा कृष्ण जब श्रंगार सजाते।
श्रृंगारित हो कर तब नर नारी
वसंतोत्सव झूम झूम मनाते।

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About सुभाष शर्मा 8 Articles
सुभाष शर्मा, इन्दौर (म.प्र.) बैंक आफ बड़ौदा से सेवा निवृत ,वर्तमान में बिल्डर एवं प्रापर्टी ब्रोकर। कविता एवं कहानी लेखन में रूचि ।
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