अहंकार की परत

अहंकार

रोहित की स्टेट बैंक भोपाल में नौकरी थी, वहीं की सहकर्मी सलोनी रोहित को बहुत पसंद थी।

साथ-साथ काम करते-करते दोनों एक दूसरे के बहुत करीब आ गये।

सलोनी ने अपने माता-पिता से भी रोहित को मिलवा दिया।

सलोनी की पसंद उसके माता पिता को भी पसंद थी ।

वे जल्दी ही उन दोनो की शादी करवाना चाहते थे।

मगर रोहित ने अपने घर अभी कुछ भी नहीं बताया था ,

सलोनी यह जानती थी की रोहित के घर मे उसके माता-पिता बडे़ भाई और भाभी के साथ छोटा सा भतिजा शिवाय भी है ,

जो जबलपुर में रहते हैं।

सलोनी ने रोहित से बहुत बार कहा की वो अपने घरवालों से बात करे मगर वह हां कहकर हमेशा टाल देता।

अब एक दिन अचानक रोहित का ट्रांसफर जबलपुर हो गया।

अब सलोनी और उसके घर वाले तनाव में आ गये, अगर रोहित चला गया और पलटकर नहीं आया तो!

सलोनी के मम्मी पापा चाहते थे की वह जबलपुर पदस्थ होने से पहले सलोनी से शादी करके अपने साथ ले जाये ।

मगर रोहित के लिये दुविधा थी क्योंकि उसने घर वालों से सलोनी के बारे में कोई बात नहीं की है,

घर वाले शादी के लिये इन्कार तो नही करेंगे।

बस सलोनी हमारे घर में कैसे रह पायेगी ।

मेरे घर वाले प्राचीन विचारधारा के साथ बहुत ही आदर्शवादी, परंपराओं का निर्वाह करने वाले

और इसके विपरीत सलोनी पूरी तरह आधुनिक, निशा भाभी ने तो सबके दिल जीत लिये

मगर क्या सलोनी ऐसा कर पायेगी ,

अंततः रोहित ने सोचा शादी तो करो आगे जो होगा देखा जायेगा।

उसने सलोनी से शादी के लिये हां तो कर दिया मगर वो चाहता था की ,

वह भी अपना ट्रांसफर भी जबलपुर में करवाये ताकी हम साथ रह सके ।

मगर सलोनी नही चाहती थी,

क्योंकि यहाँ उसके मम्मी पापा अकेले हो जाएंगे और उसके सिवाय उनका कोई नहीं है।

रोहित हम वापस यहीं आ पायेंगे ।

मगर रोहित ने सलोनी से कहा हम जहाँ रहेंगे वहीं तुम्हारे माता -पिता भी रहेंगे।

तुम भी अपने परिवार के साथ और मैं भी अपने परिवार के साथ ,सलोनी मान जाती है ।

रोहित अपनी जान पहचान से सलोनी का ट्रांसफर भी जबलपुर करवा लेता है ।

रोहित अपने घर खबर करके कहता है की उसका ट्रांसफर जबलपुर हो गया हैं और वह अपने घर आ रहा है।

घर मे सब बहुत खुश होते है।

भाभी निशा रोहित का कमरा साफ करवाती है ।

लाडले देवर के पसंद के सब व्यंजन तैयार करती है,

निशा अपनी सास से कहती है

देखना मां अब देवरजी शादी के लिये भी राजी हो जाएंगे ।

देखना अब जल्द ही मेरी देवरानी भी आ जायेगी।

रोहित के पिताजी और भाई जबलपुर के कपड़ा व्यापारी है,

भाई ने पढ़ाई के बाद अपने पिता का कारोबार सम्भाल लिया।

कुछ साल पहले पिताजी को लकवा लगने के कारण

अब पुरा कारोबार रोहित के बडे़ भाई राघव ही सम्भालते है।

इधर रोहित सलोनी शादी कर लेते हैं

और सलोनी के माता-पिता को जल्दी ही उन्हें जबलपुर बुलवाने का आश्वासन देकर दोनों जबलपुर के लिये निकलते है।

रोहित निकलने से पहले अपनी भाभी को फोन लगाकर अपनी शादी के बारे में बताता है,

और सब कुछ सम्भालने के लिये कहता है।

निशा रोहित की शादी के बात सभी घर वालों को बताती है ,

और कहती है देवरजी शादी करके आ रहे हैं, अपनी दुल्हन के साथ ;

सभी चौक जाते हैं !

और उन्हें गुस्सा भी आता है ,मगर निशा सबको समझाती है की

हमें रोहित की खुशियों को ध्यान में रखकर नई बहू का स्वागत करना चाहिए।

सब मान जाते हैं।

अब तो ढोल ताशों से रोहित और सलोनी का स्वागत करते हैं।

रोहित बहुत खुश होता है की भाभी ने सब कुछ सही कर दिया ।

आज तो उत्सव जैसा माहौल है घर में ।

रोहित सलोनी को सबसे मिलवाता है, सब सलोनी को आशीर्वाद और स्नेह देते हैं

जब रोहित सलोनी को अपनी भाभी से मिलवाता है

तो सलोनी देखती है की जिस निशा भाभी की तारीफों के पुल बांधता था

वह देखने में तो सलोनी से भी ज्यादा खूबसूरत

मगर वेशभूषा एक दम साधारण ।

सलोनी ने सोचा भाई साहब को घर सम्भालने वाली चाहिये होगी ,

इसलिये कम पढ़ी लिखी लड़की से शादी कर ली होगी।

निशा सलोनी को पूरा घर दिखाती है ।

सलोनी बड़ी सी हवेली देखकर बहुत खुश होती है ,इतना बड़ा घर है रोहित का ।

फिर निशा सलोनी को उसके कमरे में छोड़ती है और कहती है

तुम हाथ मुँह धोकर नीचे आ जाओ हम सब साथ खाना खाएंगे ।

और जाते जाते निशा कहती है

सलोनी साड़ी पहन लेना ।

निशा की इस बात से सलोनी चौंक जाती है और कहती है

भाभी मैं तो सूट ही पहनती हूँ, मुझे साड़ी पहनना नहीं आती ,

और मेरे पास साड़ी भी नही है ,

सलोनी कहती है ,

कोई बात नही साड़ी तुम्हें मैं पहना दूंगी

और तुम्हारे जेठ जी अपनी दुकान से बहुत सी साड़ियाँ पहुंचा रहे हैं

तुम उनमें से अपनी पसंद की साड़ी देख लेना ;

और हाँ आज पहन लो क्योंकि शाम को मुँह दिखाई मे बहुत से मेहमान आयेंगे ।

इतना कहकर निशा चली जाती है।

सलोनी सोचती है ये मुझे अपने जैसा समझ रही है गंवार,

इतने में रोहित आ जाता है , और पूछता है मेडम कैसा लगा अपना घर ?

सलोनी कहती है बहुत अच्छा मगर तुम्हारी भाभी ऐसे क्यों रहती है।

रोहित जोर से बोलता है … सलोनी… भाभी को ऐसा नही बोलना चाहिए।

वो पूरा घर सम्भालती है, वो ऐसी ही है। मगर बहुत अच्छी है।

वो मुझसे साड़ी पहनने के लिये कह रही थी । मैं साड़ी नही पहनूंगी ।

भाभी खुद से नही कह रही थी, इस घर की परंपरा है

और अगर तुम मुझे चाहती हो तो मेरे घर के तौर तरीक़े सीखने होंगे ।

इतना कहकर रोहित कमरे से बाहर चला जाता है ।

रोहित को नाराज देखकर सलोनी सोचती है

आज ही हमारी शादी हुई और आज ही रोहित को नाराज करना ठीक नहीं।

मैं आज तो पहन लूंगी साड़ी मगर हमेशा नहीं ।

सलोनी नीचे आती है , दुकान से साड़ियों को दो तीन गट्ठर आते हैं और साथ में गहने जेवर भी।

रोहित की मां सलोनी को कहती है बेटा जो जो पसंद हो सब देख लो ।

सलोनी कुछ साड़ियाँ और गहने पसंद करती है और निशा से कहती है भाभी आप मुझे तैयार कर दो ।

निशा मुस्कुराते हुए स्वीकृति दे देती है। शाम को बहुत से मेहमान आते है सारी रस्में होती है।

सलोनी को सजी-धजी साड़ी में देखकर रोहित बहुत खुश होता हैं,

और सोचता है शायद सलोनी मेरे लिये खुद को बदल लेगी।

आज का दिन तो अच्छे से निकल गया । सुबह हो गई ।

रोहित हमेशा की तरह सुबह जल्दी वाक पर भैया के साथ चला गया निशा सुबह से किचन में व्यस्त है ।

आज सलोनी की पहली रसोई है।

मगर साढे़ आठ बज चुके हैं , सलोनी उठकर नही आई ।

रोहित की मां निशा से पूछती है बेटा सलोनी को उठा दो। मां मैं सारी तैयारी कर देती हूँ,

वह हाथ लगा देगी , आज सोने दो कल की थकान होगी।

इतने मे रोहित अपनी मां और भाभी की बात सुन लेता है।

रोहित सलोनी को उठाता है और कहता है, जल्दी उठो नहाकर तैयार हो जाओ।

सलोनी चिढ़कर कहती है ये क्या है ।

मैं क्या कठपुतली हूँ ।

जब कहा तब तैयार हो जाऊं।

मैं पढ़ी लिखी अपने पैरो पर खड़ी हूँ, मैं तुम्हारी भाभी जैसे नही हूँ ।

आ रही हूँ। तुम जाओ यहाँ से , सलोनी फिर से अपने रुम में आ गई।

रोहित की मां ने कहा जाओ बेटा रसोई में जाकर रस्म पूरी करो ।

सलोनी कहती है मां मुझे खाना बनाना नही आता मैं रसोई में क्या करुँगी।

निशा बात सम्भालते हुए कहती है ,

अरे सलोनी इधर आओ सबको अपने हाथ से परोस दो, मैंने सब तैयार कर दिया है।

सलोनी सबको खाना परोसती है।

रोहित बताता है की कल से हम दोनों ड्यूटी ज्वाईन करेंगे ।

सब स्वीकृति मे हाँ कहते हैं।

निशा रसोई में सलोनी से कहती है,

देखो सलोनी अगर तुम्हें कोई काम ना आता हो तो मुझे बता देना मैं सीखा दूंगी ।

सलोनी कहती है भाभी मुझे कोई काम सीखने की आवश्यकता नहीं ,

मैं इतना कमाती हूँ की काम वाले रख सकती हूँ।

मेरे मम्मी पापा ने मुझे इतना पढ़ाया लिखाया की मैं अपने लिये सब सुख सुविधा जुटा सकूँ।

रोहित की मां सब सुनती है और अवाक् रह जाती है।

वह सब रोहित को बताती है,

रोहित सलोनी के ऐसे व्यवहार के कारण हमेशा शर्मिंदा होता वह सलोनी को समझाता मगर सलोनी को अपनी पढ़ाई और नौकरी का अहंकार इतना है की सही गलत कुछ नही देख पाती ।

अब तो हर दिन वह निशा पर कटाक्ष कसती ।

राघव को बहुत गुस्सा आता मगर निशा सब समझा देती।

अब तो वह शिवाय को भी अपने कमरे मे आने नहीं देती ,

अगर कोई उससे कुछ कहता तो कहती की तुम लोग बहू नहीं नौकरानी चाहते हो ,

और मैं निशा भाभी जैसी नहीं हूँ। अब घर में उससे कोई कुछ नहीं कहता ।

दो माह में सलोनी ने अपने सारे ढंग बता दिये।

रोहित माता पिता और भाई भाभी को उदास देखता तो सोचता।

मैंने सलोनी से शादी क्यों की?

आज सलोनी के माता-पिता आने वाले हैं। सलोनी बड़ी खुश है।

सलोनी के पिता भोपाल में महाविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर थे ।

उनके पास अच्छी खासी जमा पूँजी थी,

इसलिए उन्होंने जबलपुर में ही अपना मकान खरीद लिया,

आज वे यहीं रहने के लिये आ रहे हैं।

सलोनी चाहती थी की वे उनके घर ही सीधे जाये मगर उसके मम्मी पापा उसके ससुराल वालों से मिलना चाहते थे।

निशा ने स्वागत की तैयारी कर दी।

सलोनी के मम्मी पापा आ गये । वे बडे़ अदब से सब से मिलें ।

निशा किचन में थी सबके लिये नाश्ता लेकर आई ,निशा को देखकर सलोनी के पापा खड़े हो गये।

अरे! मेडम जी आप? नमस्ते!

निशा भी चौंकते हुए नमस्ते करती है ।अरे सर आप !

रोहित पूछता है आप एक दूसरे को जानते हो?

सलोनी बीच में ही कहती है ये कैसे जानेंगे वो तो तुम्हारी भाभी है इसलिए नमस्ते कह रहे हैं।

सलोनी के पापा कहते हैं नहीं बेटा ये निशा मेडम है , मेरे साथ भोपाल कालेज में प्रोफेसर थीं ।

सलोनी की ऑंखें फटी की फटी रह जाती है।

मेडम ने शादी के बाद अपना ट्रांसफर यहाँ करवाया था ।

सलोनी कहती है ।पापा आपको गलत फहमी हो रही होगी ये तो ज्यादा पढ़ी लिखी नही है।

अबकी बार राघव सलोनी की बात को काटते हुआ कहता है ।

मेरी पत्नी पढ़ी लिखी है।

और तुम्हारे पापा सही कह रहे है ।

निशा ने अर्थशास्त्र से पी. एच. डी की है ,

हमारी शादी से एक साल पहले निशा की पोस्टिंग भोपाल में हुई थी,

और शादी के बाद जबलपुर तबादला करवाया था।

मगर निशा ने यहाँ केवल दो साल ही नौकरी की और नौकरी छोड़ दी

तभी रोहित की मां बोली

इसने हम सब के लिये जो सर्मपण किया, इसके लिये हमें हमारी निशा पर गर्व है,

निशा सब कुछ अच्छे से सम्भाल रही थी ।

घर भी और अपनी ड्यूटी भी, मगर शिवाय के जन्म के बाद परिस्थितियां कुछ बदल गई।

शिवाय छोटा था , और रोहित के पापा को पैरालिसिस अटैक आ गया ।

मैं घर में दोनों को सम्भाल नही पाती थी इसलिये निशा ने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया।

सलोनी की आंखे भर आई और वो निशा के पीछे किचन मे चली गई।

और निशा से लिपट कर बहुत रोने लगी ।

भाभी मुझसे गलती हो गई मैं आपके रहन सहन को देखकर आपको गंवार समझ बैठी।

आपने सबके लिये अपने करियर को दाँव पर लगा दिया।

निशा मैंने कुछ दाँव पर नही लगाया।

बस पढ़ लिखकर नौकरी कर लेना करियर नहीं होता ।

अपनों की सेवा करना ।

उन्हें खुश रखना भी एक करियर ही है ,

अगर हमारी माताएँ भी यहीं सोचती तो , शायद हम भी अपने पैरो पर खड़े नहीं हो पाते ।

हम हर काम के लिये नौकर रख सकते हैं मगर बच्चों के लिये मां नही खरीद सकते|

माता- पिता की सेवा के लिये संतान नही खरीद सकते।

तुम्हारी आँखों पर अहंकार की परत जम गई थी

इसलिये तुम मेरे पहनावे से मेरी योग्यता का आंकलन कर रही थी।

आज शायद ये परत हट गई होगी योग्यता हमें विनम्र बनाती है। अहंकारी नही ।

निशा और सलोनी बहनों की तरह गले लग गई।

रोहित ने यह सब देखकर राहत की सांस ली की

हे भगवान सलोनी की समझ में तो आया।

Photo by Anika Huizinga on Unsplash

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About कविता प्रमोद पगारे 5 Articles
सौ. कविता प्रमोद पगारे, बलवाड़ा, शिक्षा बी.ए . गृहणी हूँ। साथ ही कल्पनाओं को शब्दों से कतारबद्ध करने शौक रखती हूँ।नये नये व्यंजन बनाना और नृत्य में भी रुची है
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Sulbha joshi
Sulbha joshi
9 months ago

अति सुन्दर कहानी 👌👌हमारी शुभकामनाये आशीर्वाद

नरेन्द्र जैन
नरेन्द्र जैन
1 month ago

अच्छी कहानी,शिक्षाप्रद