क्षितिज तक

नन्ही सी वह बिन मां की बच्ची जब दूसरे बच्चों को अपनी, अपनी मां के साथ लाड़-प्यार और हट करते देखती तो, सोचती कि मेरी मां कहां शून्य में खो गई।

वह होती तो मैं भी कितनी खुश रहती। इसी कारण वह ज्यादातर अकेली ही रहती। उसे बताया गया था कि मां दूसरी दुनिया में चली गई है।

जब भी उसकी निगाहें क्षितिज तक जाती तो उसे वहां धरती आकाश मिलते से नजर आते, एक दीवार सी नजर आती। क्षितिज के आगे कुछ नजर नहीं आता, वह सोचती कि क्या दुनिया यहीं तक है या इसके पार भी दूसरी दुनिया है, और है तो शायद मां उसी दुनिया में होगी ।

वह सोचने लगी आज तो मैं क्षीतिज के उस पार जाऊंगी ही। वह मन में हर्षित हो आगे बढती जाती पर ये क्या? वह जितना आगे जाती उतना ही खुद को शून्य में पाती।

अंतत: वह जोरों से रो पड़ी, उसकी आवाज सुनकर पास ही सो रही छोटी सी बेटी ने कहा ….मम्मा क्या हुआ? और शून्य कहें या स्वप्न से बाहर आई, अपने चारों ओर देखा , फिर अपनी छोटी सी गुड़िया रानी को बाहों में भींच कर बोली मैं तुम्हें छोड़कर कभी नहीं जाऊंगी मेरी परी।

अब न वह क्षितिज था न ही शून्य।

Photo by Tom Swinnen from Pexels

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About जागृति डोंगरे 11 Articles
मैं जागृति श्यामविलास डोंगरे मंडलेश्वर से . पिता --- महादेव प्रसाद चतुर्वेदी माध्या (साहित्यकार) हिन्दी, अंग्रेजी, निमाड़ी मंडलेश्वर शिक्षा --- M. A. हिन्दी साहित्य मैं स्कूल समय से कविताएं लिखती रही हूं , काफी लम्बे समय से लेखन कार्य छूट गया था, अब पुनः शुरू कर दिया । इसके अलावा अच्छी,अच्छी किताबें पढ़ना , कुकिंग का भी शौक है। रंगोली बनाना अच्छा लगता है। कढ़ाई , बुनाई भी बहुत की,अब नहीं करती।
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Megha Billore
Megha Billore
1 year ago

बहुत ही सुंदर लघुकथा क्षितिज पढ़ते हुए भावुक हो गई प्रतुतिकरण बहुत ही सुंदर रूप मे किया गया। लेखिका ने बहुत ही निराले अंदाज मैं दिल को छू लिया ।

Gurupreet kaur
Gurupreet kaur
1 year ago

Very nice