भूख का तांडव

भूख का तांडव

शीर्षक : भूख का तांडव

काय! वह मैडमजी कौन थी।

कितनी अच्छी थी ना।

हां झमरु पर ये नहीं पता कैसी थी। हम सबको चलने कहा ।

हमारे साथ फोटो खिंचवाई और खाने के लिए दे दिया फिर ..

फिर!क्या बड़की?

देखा नई, कैसे भगा रही थी।

हां बड़की हमें हाक रही थी जानवर के मुताबिक।

हमारा फोटो क्यो खिंचा? हम सुंदर है क्या?

छुटकी हंसी, और कहने लगी उनसे तो हम ज्यादा ही मोटे ताजे है और तू तो गोल मटोल मेरे भाई।

सब के सब प्रसन्नता से मैडम का दिया पेक डिब्बे का खाते खाते हंसने लगे।

बड़की क्यो ले गए थे ,अपन चारों को। बड़ी सी बिल्डिंग में?

झुमरू मेरे भाई तू न समझेगा।

क्योँ बहना?

तो सुन ,जो मेरकु मालूम है,

“वे हमको खाना दिया है, ऐसा फोटो खींचते हैं और सरकार से हमारे खाना का पैसा मांगते हैं।”

फिर बड़की रोज क्यो न खाना देते हैं ?

वो नहीं पता।

मैं बड़ा हो कर पता लगाउंगा।

अच्छा! झमरू । तो उसके लिए स्कूल में पढ़ना पड़ता है।अभी पेट भर खाना खा ले।

हां ,देख बड़की इस बार कोई मैडम आए तो खाना नहीं लेना। कह देना झुमरू को पढ़ा दो।

हां भाई, हम जरूर बोलेंगे ।

पर जब हम दो तीन तक भूखे होते हैं ना! तो केवल पेट दिखता है।

और पेट में भूख का तांडव!

और सभी चुपचाप खाने में जुट गए।

Image by Sonam Prajapati from Pixabay

और कहानियां पढें : शब्दबोध कथांजलि

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About भारती नरेश पाराशर 4 Articles
नाम :- भारती नरेश पाराशर शीक्षा:- M.A , M.S.W साहित्य में रूचि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य प्रकाशित।
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