एक खुली चिट्ठी – ” ऊपर वाले ” के नाम

चिट्ठी ऊपर वाले के नाम

एक खुली चिट्ठी – ” ऊपर वाले ” के नाम

(अब यहाँ यीशु या ईश्वर या अल्लाह या और कुछ इसलिए नहीं लिखा क्योंकि ये ख़त सभी की तरफ़ से है.. )

प्रसंग : कोविड -19
संदर्भ : कोरोना का कहर.

ओ दुनिया के रखवाले , हे भैया “ऊपर वाले”, प्रणाम / सलाम / एहतराम / सुबह शाम.

भैया , ये तुम्हारे मृत्युदूत का नाम तो कोविड -19 रखा है ना.. पर यहाँ तो सन्’ 21 ‘ का जून भी जाने में है,

और ये रायता ऐसा फैला है कि समेटने में ही नहीं आ रहा किसी से.

हालाँकि, हम ही सब , दुनिया भर से जमात भी बुलाएँगे, बडे़ बड़े मेले भी लगाएँगे, बेसबब यहाँ-वहाँ भीड़ भी बढ़ाएँगे.. पर ,

हर मुश्किल से निकालने की जिम्मेदारी , तो “ऊपर वाले ” की ही बताएँगे ..

तो..सुनो भैया, भेजो किसी को , जो इस ” कोरोना ” को वापस ले कर जाए,

क्योंकि ये नामुराद अब तक हमारे बहुत सारे, बहुत प्यारे , लोगों को तुम्हारे पास भेज चुका है

बेवक्त.. बेरहम.

अगली काॅलोनी में वो गुप्ता अंकल जी हैं ना,

कितने धार्मिक हैं.. कैसे बताएं. आस-पास के किसी भी मंदिर में चले जाओ तो तुमसे पहले, उनके नाम के दर्शन होते हैं,

(दानवीरों की सूची में , सबसे ऊपर )..

लेकिन इस कोरोना ने क्या कोहराम मचाया है उनके कुटुम्ब में, जा के देखो जरा.. हे भगवान.

और अपने ईमानदार रहमत चाचा जैसे नेक इंसान पर भी कोई रहम नहीं.. ??

ताउम्र की गई तुम्हारी इबादत के सबूत, दो गहरे निशान दूर से दिखते हैं.. उनकी पेशानी पर. पर , उन्हीं के दोनों बेटे..!! कहाँ ले गया कोरोना, खुदा ही जाने..

डेनियल की दास्तान भी कम दर्दनाक है क्या..

चर्च की तुम्हारी हर चर्चा में शामिल रहने वाले के घर से फ़क़त तेरह दिनों में, तीन ताबूत उठा चुके हैं हम पडोसी.

क्या है ये.. जीसस? प्रार्थनाओं का प्रतिफल..!!

बहुत हुआ भैया, और कब तक?

सुना है कि , ” तीसरा दौर ” भी आएगा. उपर से ये बारिश का मौसम आ गया है. कहाँ से लाएँगे हम, ज़मीनें, दफ़नाने के लिए और लकड़ियाँ , जलाने के लिए?

नदियाँ भी किसी बेजान को, कितनी देर रख पाएँगी अपनी गहराई में ?

ये तो सही है कि , कुछ कुछ अच्छा भी हुआ है

मसलन .. उनकी बिटिया की शादी में फतेहाबाद वाले फूफा़जी कीफिक्स डिपाॅज़िट फोकट में फ़ना हो जाती. पूरे दस लाख की थी. कोरोना ने मुकम्मल बचा ली.

वो यूँ ,कि न तो उन्होंने बुलाना था, और न किसी को जाना था. तो , रिश्तेदारों ने मोबाइल पे ही रस्में भी निभा दी, विदाई भी करा दी.

न पार्टी न परिसर , मजे़ करो जी भर कर .

मगर , एक वो हमारे कज़िन , कन्नौद वाले.. काँट्रेक्टर . उनके साथ जरा उल्टा हो गया. सोचा था उन्होंने कि,

डेस्टिनेशन वेडिंग करेंगे कहीं फाईव स्टार में काली कमाई का पूरा काम लगा देंगे. उसी बाजा़र में ,

तो सारी काली कैश भी सलट जाएगी, और कंजूसी वाली इमेज भी पलट जाएगी. पर हाए रे कोरोना..

इसका प्रोटोकॉल बीच में अड़ गया और 3 BHK से ही सब कुछ करना पड़ गया

अब , छोटे बेटे की शादी तक .. बुढ़ापे की हड्डियों का यही रोना है , कि कैश की गड्डियोंं पर ही जागना सोना है.

तो उपर वाले भैया , अब हमको माफ करो.

तुम तो सब कुछ कर सकते हो.. कण कण में समाए हो.. बस इस ” अद्रश्य कण ” को जरा अपने पास वापस बुला लो.

बाकी, तुम समझदार हो.. खुद समझ लेना.

हम, धरती वासियों को .. तुम्हारा अभय देना

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Photo by Kate Macate on Unsplash

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About चंद्रशेखर दफ्तरी 1 Article
रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर जनवरी २०१९ में भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त संगीत, साहित्य, पर्यटन, फिटनेस में रूचि।
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माया कौल
माया कौल
1 month ago

बहुत खूबसूरत,,,,,भाव बहते से

Vanee
Vanee
1 month ago

Bahot accha likha aapne