वृद्धों की दयनीय स्थिति का निदान

वृद्धों की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है ? तथा इस स्थिति से वृद्धों की दशा को सुधारने के लिए समाज क्या कर सकता हैं।

समाज में वृद्धों की दयनीय स्थिति के लिए कोई एक कारण नहीं अपितु अनेक कारण जिम्मेदार है।

किसी को दोष देने के पहले अगर हम अपने आपको भी एक नजर देख ले तो स्थिति अपने आप समझ में आ जायेगी।

आज वृद्धों की दयनीय स्थिति रूपी वट वृक्ष इतना विशाल हो गया है, यह हमें दिखाई तो दे रहा है,

लेकिन इनकी जड़ें कहाँ से निकल रहीं हैं, इसे हम देख नहीं रहें हैं या देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं ।

आज से 50 – 60 साल पहले हमारे बुजुर्गो का बुढ़ापा बड़े आराम से बिता है, हाँ कहीं कोई अपवाद हो सकता है।

इन बुजुर्गों की अच्छी स्थिति का मुख्य कारण यह था, उस जमाने में बच्चे अपने बुजुर्गों को बहुत मान-सम्मान देते थे, सभी बच्चे अपनी मर्यादा का पालन करते थे, सब कर्तव्यनिष्ठ थे।

उस जमाने में संयुक्त परिवार होते थे, पुरुष थोड़े पढ़े-लिखे होते थे, महिलायें बहुत कम शिक्षित होती थी, घर के सभी काम, खाना बनाने से लेकर घर की साफ -सफाई सभी काम स्वयं अपने हाथों से करती थी।

महिलाओं का दायरा घर के अंदर रसोई तक ही रहता था।

उस जमाने में पुरुष प्रधान समाज होता था, बुजुर्गों की बात पत्थर की लकीर होती थी,

धीरे -धीरे समय बदला, शिक्षा को बढ़ावा दिया गया, बेटों के साथ -साथ बेटियों को भी शिक्षित किया जाने लगा, सुख सुविधा बढ़ने लगी, अब बहूऐं शिक्षित हो गयी, अब बहू- बेटे पढ़े-लिखे और सास-ससुर कम पढ़े-लिखे, तकरार की पहली शुरूवात यही से शुरू हुई।
हालांकि बहू- बेटे अभी भी अपने बुजुर्गों की बात को, मान – सम्मान देते थे, बहुऐं शिक्षित, संस्कारी और मर्यादित होती थी।
अब सुविधाएँ उपलब्ध होने लगी। अब बहुओं को घर के कामों से थोड़ी राहत मिली, लेकिन महिलाएँ बाहर नौकरी नहीं करती थी। पढ़ी लिखी बहूओं की सारी पढ़ाई, चूल्हे चौंके में झौंक दी गई थी।
उस वक्त बुजुर्गों की सोच महिलाओं के प्रति बहुत अच्छी नहीं थी।
नयी पीढ़ी अब शिक्षित व जागरूक हो चूकि है, पर नयी पीढ़ी अब भी बड़ो की बहुत इज्जत करती थी परन्तु बुजुर्गों के मन में धीरे- धीरे ये बात घर कर गई कि हमारे बच्चे अब हमारी इज्जत नही करते हैं। बुजुर्ग सास को लगता है, कि बहूऐं अपनी मनमानी करती है। बच्चो को लगने लगा कि उनके माता-पिता कुछ समझते ही नहीं है हमें गलत समझते है, धीरे- धीरे दोनों तरफ गलतफहमियां बढ़ने लगी। बेटे- बहू अलग होकर नया घर बसाने लगें, नौकरी करने वाले बेटे शहरों में बस गये। बहू, बेटे शहरी वातावरण में ढलने लगे, पुराने विचारों वाले बुजुर्गों को ना पसंद करने लगे, माता-पिता बच्चों के पास रहते तो उनकी उपेक्षा की जाने लगी। इधर माता-पिता भी अपने बहू- बेटो का रहन सहन आदि को नापसंद करने लगे, घर में छोटी-छोटी बातों पर आपसी मतभेद बढ़ने लगे,
धीरे- धीरे बहू -बेटे अपनी नई दुनिया में रच बस गये, बूढ़े माँ बाप एकाकी होकर अपने आप में सिमटते चले गये, अब वो अपने पैेतृक घरों में निराश होकर अकेले ही बची हुई जिदंगी काटने को विवश हो गये । बहुत से बेटे, वास्तव में चाहते हैं कि उनके माता-पिता उनके साथ रहें, लेकिन माता-पिता को बच्चों के पास रहना तो अच्छा लगता है लेकिन शहरों में
माता-पिता को अपने मन पसंद कम्पनी नहीं मिलती इसलिए उन्हें लगता है कि हमें अपने गाँव में ही रहकर अपना शेष जीवन बिताना चाहिए।
समय के परिवर्तन के साथ साथ बुजुर्गों में भी परिवर्तन हुआ,
आजकल वर्तमान में पढ़े लिखे, माता-पिता ने अपने आप को बच्चों के हिसाब से ढाल लिया है। सास, बहूओं के रिश्ते भी बहुत अच्छे से सुधर गयें हैं, वो एक दूसरे को समझने लगी है। आज की सास, बहू और बेटी दोनो को एक समान दृष्टि से देखने लगी है।
लेकिन आजकल अधिकांश बच्चे विदेशों में रहना पसंद करते हैं, ऐसी हालत में माता-पिता को मजबूरी में अकेले या वृध्दाश्रम में बुढ़ापा काटना पड़ रहा है, क्योंकि अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों पर आवश्यकता से अधिक विश्वास करते हैं और अपनी सारी जमा – पूँजी बच्चों का कैरियर बनाने में लगा देते है तथा कुछ लोग अपने जीते जी अपनी प्नापर्टी बच्चों के नाम कर देते है, जो की गलत है, फिर बुढ़ापे में परेशान होते है, इस कारण भी आज बहुत से वृध्दो की दशा दयनीय है।
बच्चों को भी यह एहसास होना चाहिए कि आज हमनें अपने कैरियर के कारण अपने माता-पिता को अकेला कर दिया है कल यही हालत हमारी भी हो सकती है हमें भी हमारे बुढ़ापे में हमारे बच्चे अकेले जीने पर मजबूर कर देगें।

अगर न‌ई पीढ़ी को अपने भविष्य में अपना बुढ़ापा सुख पूर्वक बिताना हो और बुजुर्गों को वर्तमान में सुख शान्ति से रहना है तो चाहे अपने देश में हो या विदेश में, माता-पिता और बच्चों को साथ साथ रहकर एक दूसरे का ध्यान रखना होगा, बुजुर्गों को भी समय के साथ अपने आपको बदलना होगा और बच्चों को भी बुजुर्गों को सम्मान पूर्वक रखना होगा।
दोनों पीढ़ियों को आपस में एक दूसरे को धैर्य और समझदारी के साथ सहयोग देना होगा, ताकि रिटायरमेंट के बाद खुशी -खुशी दोनों पीढ़ी एक साथ रहना पसंद करें। साथ -साथ रहने में दोनों को फायदा है, जहाँ एक ओर बुढ़ापे में माता-पिता को अकेले नहीं रहना पड़ेगा और दूसरी तरफ अगर बहू- बेटा दोनों सर्विस कर रहे हैं, तो घर में बच्चों को नौकरों के भरोसे छोड़ने से तो अच्छा है वो अपने दादा-दादी के साथ रहें, बच्चों को प्यार के साथ साथ सुसंस्कार भी मिलेंगे और स्कूल के होमवर्क में भी मदद मिलेगी, समय से मनपसंद ताजा नाश्ता-खाना भी मिलेगा।

अगर न‌ई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी कुछ खास बातों को समझें, तो दोनों पीढ़ियों में अच्छा सामंजस्य हो सकता है, क्योंकि ताली हमेशा दोनों हाथों से बजती है।
बच्चों को, बूजूर्गो की आवश्यकता की जरूरतो का ध्यान रखकर काम करना चाहिए।
सुबह की चाय से लेकर रात का खाना समय से और दोनों के स्वादानुसार होना चाहिए।

न्यूज़ पेपर, मनपसंद किताबें, टी. वी., जरुरत का सामान आदि की सुविधा उनके कमरे में ही रहे तो अच्छा होगा।

हो सके तो रात का खाना साथ – साथ खाये, और दोनों एक-दूसरे के, दिनभर के हालचाल पूछे।

बच्चों को भी स्कूल जाते वक्त या वापस आने के बाद कम से कम एक बार, दादा-दादी को प्रणाम, बोलना चाहिए। खाली समय में उनके पास बैठकर हालचाल पूछे, रात को सोने के पहले गुड नाईट करे।
दादा-दादी को भी बच्चों के साथ दोस्तो जैसा रिश्ता रखना होगा।

अगर चलने फिरने में माता- पिता असमर्थ है, तो उनके कमरे, बेड, बाथरूम की सफाई के साथ साथ उनकी खुद की सफाई का भी विशेष ध्यान रखें।
उनकी जरूरत की चीजें उनके पास एक टेबल पर रख दें, बेल बजाने का बटन भी उनके हाथ के पास रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर वो किसी को बुला सके।

छुट्टी के दिन साथ बैठ कर कुछ देर व्यतीत करें।
बच्चों को भी कुछ देर उनके साथ बैठकर, कुछ गेम खेलना चाहिए या
कोई कहानी या उनके अनुभवों को सुनना चाहिए।
महीने, दो तीन महीने में एक बार उन्हें अपने साथ माॅल, बाजार या लांग ड्राइव पर ले जाये।
कभी उनके दोस्तों को घर पर बुलाये या दोस्तों के साथ उन्हें होटल में खाना खिलाने की व्यवस्था करें।
उनके हम उम्र के साथ बी. सी. में शामिल कर दे, ताकि हर महीने उनका मनोरंजन हो जाये।
साल में कुछ दिनों के लिए कहीं अपनी हैसियत के अनुसार उन्हें घूमने के लिये भेजे या साथ में लेकर जाये। कभी- कभी दोनों पीढ़ियां एक दूसरे को अपनी आमदनी के हिसाब से सरप्राइज गिफ्ट लाकर दे। जन्मदिन और शादी की सालगिरह मनाये और उनके दोस्तों को भी शामिल करें।
जब बहू – बेटे अपने माता-पिता का इतना ध्यान रख रहे तो, माता-पिता को भी अपने बच्चों को धन्यवाद के रूप में पूर्ण सहयोग और प्यार देना चाहिए।

इसी तरह दोनों पीढ़ियां एक दूसरे का ध्यान रखेंगे तो बदले में क‌ई गुना सुखद प्यार, सम्मान और आशीर्वाद पायेंगे। छोटे बच्चे भी जब आपको यह सब करते देखेंगे तो आगे भविष्य में वो भी आपका ऐसा ही ध्यान रखेंगे, बच्चे वही करते जो वो बचपन से देखते, सुनते आ रहे है।
अगर हर पीढ़ी दर पीढ़ी आपस में धैर्य, समझदारी और आपसी प्रेम से काम लें तो समस्या का समाधान अपने आप हो जायेगा।

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