शिवजी के प्रतीक

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हर मंदिर में हमने शिव जी को एक लिंगी के रूप में देखा है उन्ही को हम पूजते हैं ।

किन्तु ज़ब शिवजी का ध्यान करते हैं तब एक शांत मूर्ति तपस्या में लीन सिर पर जटायें जिन पर से निकलती हुई गंगा माँ सिर पर अर्धचंद्र , गले में सर्प नीलाकंठ सी छबि दिखाई देती है ।

आज हम शिव जी के इन्हीं प्रतीकों के बारे में जानते हैं ।

शिव जी को कई नाम है जी में एक नाम औढरदानी भी हैं , यानी जो भी उनके पास किसी इच्छा से विश्वास लेकर आया उसकी इच्छा पूर्ण करना , चाहे वो स्वयं किसी भी मुसीबत में फंस जाए पर याचक को कभी खाली हाथ नही जाने देना उसकी इच्छा पूरी करना ।

हम जानते हैं कि ब्रम्हाजी सृष्टि रचते हैं विष्णुजी पालन करते हैं और शंकर जी संहार करते हैं ।

कहते है शिव ही वो शक्ति है जो सृजनहार है , पालनहार है और संहारक भी है । इनमें तीनों ही समाये हैं ।
शिव जी के प्रतीकों का अलग रहस्य है । जिनका गहन अर्थ है , ऋषि मुनि भी जिनको चिंतन मनन करते हैं पर जो मुझे समझ आ रहा है उसको हम सरल रूप से समझते है।

शिवजी जटा धारी है ,

उनका एक नाम व्योकेश है । व्योम याने आकाश तो जटाएं आकाश का प्रतीक है । सृष्टि में यह तय था कि गंगा को स्वर्ग से नीचे आना है और गंगा में इतना वेग था कि अगर वो आकाश से सीधे धरती पर आती तो सब तहस नहस हो जाता । इसलिए आकाश मार्ग यानी शिवजी की जटाओं में समाती हुई गंगा पृथ्वी पर आई इस तरह लोककल्याण के लिए शिवजी ने उनका भार सम्भाला ।

उनके गले में सर्प लिपटा रहता है सर्प तमोगुण का प्रतीक है जिसमें जहर भरा है किसी को डस ले तो तत्काल मर जाता है ।उसी सर्प याने तमोगुण को अपने वश में किया है जो हमें यह सिखाता है कि तम को अपने वश में करना चाहिए व्यक्ति या परिस्थिति कैसी भी हो उससे डरने या उससे भागने के बजाय उसे अपने वश में करना ।

शिव जी को नीलकंठ कहा गया है क्योंकि समुद्र मंथन से निकला जहर उन्होनें पी लिया था जिसे उन्होंने अपने कंठ में ही रख लिया अगर निगल जाते तो वो बचते नही । ये हमें सीखाता है कि जीवन में कितनी भी कड़वाहट आये किसी के द्वारा कितना भी जहर अंदर भरा जावे उसे अपने कंठ में ही रोक लो उसे शरीर के अंदर मत जाने दो और ना ही उगलो ताकि उसकी कड़वाहट ना मन में रहे ना बाहर आ कर आसपास का माहौल खराब करें ।

शिव जी के मस्तक पर गंगा और चंद्रमा जो विराजित है जो शीतलता का प्रतीक है अर्थात मन में या शरीर के अंदर कितना भी गुस्सा हो दिमाग को ठंडा रखो ।

शिव जी के हाथ में त्रिशूल है जो इच्छा , ज्ञान और क्रिया का सूचक है हमें यह बताता है कि इच्छा ज्ञान और क्रिया कर्म जहाँ जरूरत हो वहाँ ही व्यक्त करना ये हमारी रक्षा भी करते हैं एवं जरूरत पड़ने पर विरोधियों को चित भी करते हैं ।

उन्हें चर्म धारण किये हुए बताया है व्याघ्र जो हिंसक होकर जंगल का राजा कहा जाता है और उसका उसे अहंकार है जिसकी त्वचा को शिव जी धारण किया है अर्थात अहंकार और हिंसा को उन्होंने अपने ऊपर लपेट कर उसे अपने पैरों में जगह दी है ।
वैसे ही अहंकार और हिंसा को कभी अपने ऊपर हावी नही होने देना ।

कहते है शिवजी ने श्मशान की भस्म धारण की है जो हर दम यह बताती है कि यह जीवन नश्वर है हमें हमेशा यह याद दिलाती है कि हर किसी का आखरी ठिकाना श्मशान ही है जहां भस्मीभूत हो जाना है ।
उनकी सवारी बैल है

शिवजी को वृष वाहन भी कहा है वेद ने धर्म को चार पैरों पर खड़ा बताया है । धर्म , अर्थ काम और मोक्ष इन चारों को नन्दी का रूप दिया जिस पर सवार होकर इंसान संसार से पार पा सकता है ।

नन्दी को शक्ति का प्रतीक भी बताया है शिव जी ने उस शक्तिशाली को भी अपने द्वार पर भी बैठा रखा है ।

अर्थात कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो अपने आपको ऐसा बनाओ की नन्दी जैसा जानवर भी हमारे घर के अंदर आने की सोचे भी नही। बल्कि हमारा दास बन कर रहे

इस तरह शिवजी का हर प्रतीक हमें जीवन जीना सिखाता है ।

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About मञ्जुला शर्मा 5 Articles
श्रीमति मञ्जुला शर्मा शिक्षा B.A. गृहणी हूँ , पिताजी स्व. श्री बैजनाथ जी जोशी हिंदी साहित्य के व्याख्याता थे मेरी साहित्य में रूचि है कहानी कविताएं लिखना और पढ़ने का शौक है.
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