पंचज – भाग १

प्रकृति के पाँच “ज” महत्वपूर्ण हैं, जल, जमीन, जंगल, जन और जानवर क्योंकि प्रकृति में चहल पहल इन्हीं पंचज से है

सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार , वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी यही दर्शाता है, धर्मग्रंथों में भी ऐसा ही पढ़ने में आता है, इन्हीं आधारस्तंभ से संकलन और अपने तथा अपनों के अनुभवों को “शब्दबोध” के माध्यम से सुधि पाठकों के लिए लेखनबद्ध कर प्रकृति को समर्पित कर रहा हूँ , प्रतिक्रिया के मेहनताने की चाह में!

युग युगांतर पूर्व, हमारा भूतल , चमकते हुए अँगार, जिसे हम “सूर्यदेव” कहते हैं , में ही समाहित था, और प्रकृति तथा पर्यावरण के अनबूझे खेल से , सूर्यदेव ने अपना एक भाग ,
सहस्त्रों मील दूर बहते हुए जल , जिसे हम “सागर” कहते हैं , को समर्पित कर दिया ।

सूर्यदेव की इसी कृपा से हम अपने जीवन में सुख-दुख का आनंद भोग रहें हैं ।
सूर्यदेव का यह अंश जिसमें कईं खनिज तत्व सम्मिलित थे जब सागर में समाहित हुआ| तब स्वाभाविक रूप से , ऊँचे निचे आकार में परिवर्तित होने लगा और सागर तल पर स्थान स्थान पर स्थापित होने लगा|

शीतल जल के सम्पर्क में आकर शनैः शनैः शीतलता को पाने लगा, कारणवश जलचरों का पर्यावरण दूषित हुआ, जिसके प्रभाव से पानी के किनारों पर जीवाश्म उत्पन्न होने लगे|

सुना है कि सर्वप्रथम “काई” (Fungi) वनस्पति भूतल पर आई, कालांतर में सम्पूर्ण भूतल वनस्पति से लहलहाने लगा, और जानवरों की उत्पत्ति हुई|

कदाचित तब प्रकृति ने इन वनस्पतियों के उपभोग और जानवरों की अठखेलियों का आनंद लेने के लिए प्रकृति और पर्यावरण के सम्मिश्रण से “जन”  (मानव) की उत्पत्ति करने का निर्णय लिया, और मनु से मानव जाति का जन्म हुआ।

धीरे धीरे मानव की सँख्या में वृद्धि होती रही और मानव ने इनके उपभोग और आनंद के साथ साथ प्रकृति का दोहन आरम्भ कर दिया। वन में रहने वाले वनवासियों ने अपने परिवार की सुरक्षा के लिए चारदीवारी और छत की व्यवस्था की|

पेट पालन के लिए जानवरों के साथ साथ वनस्पतियों का उपभोग करते करते, जब कमी महसूस करने लगे तो, चिन्ता होने लगी, तब उन्हें समुदाय की आवश्यकता महसूस हुई , समुदाय में विभिन्न प्रकार की सोच होने के कारण , किसी भी सम्मिलित निर्णय पर एकजुट नहीं हो पा रहे थे ।

तब समूहों में बंटने की आवश्यकता समझ में आने लगी । समुदाय में विशेष तौर पर पाँच प्रकार की सोच वाले लोग होते हैं –

  1. मस्तिष्क का उपयोग कर नवीन योजनाएँ तैयार कर समाज की सुरक्षा एवं रोजी रोटी की व्यवस्था करने के लिए नियमावली तैयार करना ।
  2. समाज के लिए आर्थिक विकास, एवं पेट पालन की व्यवस्था करना ।
  3. समाज की सुरक्षा व्यवस्था तथा अनिवार्य आवश्यकताओं (शुद्ध जल, हवा, स्वास्थ्य, ज्ञान तथा आवागमन की सुविधा जुटाना, जंगली जानवरों, दुश्मनों से बचाव करना)की पूर्ति करना ।
  4. जो मेहनती हो और उपरोक्त तीनों व्यवस्था में निर्देश अनुसार सहायक बनें ।
    5- घरेलू प्रबन्धन एवं घर की सम्पूर्ण व्यवस्था करें ।

उपर्युक्त आधार पर समूह तैयार कर सदस्यों का निर्वाचन किया गया। ततपश्चात उनका नामकरण किया गया।

  1. ब्राम्हण, क्यूँकि उनके बनाये गए नियम ब्रम्ह वाक्य होंगे। और ये अपने समुदाय के विकास के लिये ही कार्य करने के लिए बाध्य होंगे, प्रतिफलन में इन्हें दक्षिणा देकर इनके परिवार की पालन की जिम्मेदारी अन्य समूहों की रहेगी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, और शांति व्यवस्था हेतु धर्मकर्म करना इनका धर्म होगा।
  2. वैश्य, क्यूँकि ये विश्व के लिए आर्थिक विकास कर , रोजगार के अवसर प्रदान करेंगे, तत्कालीन वैश्य , खेती किसानी करने वालों को ही माना गया क्योंकि धरती माता ही रोजगार के अवसर प्रदान कर सकती थी। अपने समस्त कृषि कार्य एवं उनके विनिमय के लिए इन्हें ब्राह्मण समूह की सलाह मानकर ही कार्य करना अनिवार्य होगा।
  3. क्षत्रिय , क्यूँकि अपने अपने क्षेत्र की सुरक्षा का प्रभार इसी प्रकार के लोगों को सौंपा गया, सम्पूर्ण अन्य समूह की सुरक्षा की जवाबदेही तय होने के कारण इन्हीं में से कोईं समस्त समूहों का मुखिया रहेगा, जिसे “राजा” कहा जायेगा। इन सभी कार्यों में ब्राह्मण समूह की सलाह से ही निर्णय लेना इनका मुख्य कर्तव्य होगा।
  4. सेवक , ये अन्य समस्त समूहों की सेवा में सहायक के तौर पर कार्यरत रहेंगे और जिनकी सेवा में रहेंगे, वो इन्हें मेहनताना देकर , इनके परिवार का पालनहार होगा। कठिनाई होने पर यह समूह ब्राह्मण समूह की सलाह पर अपनी कठिनाई दूर करने की कार्यवाही करेंगे।
  5. गृहिणी , घर के सम्पूर्ण प्रबंधन की जवाबदेही इस समूह की होगी, स्वाभाविक तौर पर यह समूह महिलाओं का होगा। कुशल प्रबन्धन , स्वच्छता और स्वास्थ्य सम्बन्धित सलाह ब्राह्मण समूह से लेकर  घर में सुख शान्ति का वातावरण निर्मित करना भी इनकी जवाबदेही में होगा।

उक्त व्यवस्था में परिवारवाद नहीं रखा गया था, एक ही परिवार के सदस्य , विभिन्न समूहों में सम्मिलित किये गए थे ।

…………

                                      क्रमशः …

चूँकि यह लेख दुनिया के प्रारंभ से शुरू किया है, और आज के दौर तक चलता रहेगा, अतः कुछ बड़ा है, इसलिये हर माह , इस लेख का अध्धयन कीजिये, और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहिये , कृपया प्रोत्साहित कीजिये, मेरा प्रयास है कि मैं अपने धर्म को निभा सकूँ ।

नमः

Photo by NASA on Unsplash

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About मोहन कैलाशचंद्र गावशिन्दे 3 Articles
मोहन कैलाशचंद्र गावशिन्दे , खरगोन व्यवसाय प्रबंधन में स्नातकोत्तर, स्फटिक, कुंदावाणी और किंग ऑफ न्यूज़ साप्ताहिक कार्य, जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन में समन्वय एवं जिला प्रशिक्षक के तौर पर कार्यानुभव
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Kavita pagare
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7 months ago

बहुत ही अच्छे से विवरण दिया हर वर्ग के कर्म को