होली का डांडा

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होली का डांडा या नेतृत्व की छड़ी

निमाड़ क्षेत्र के त्यौहार अपने आप मे एक विशेषता लिए होते है ।

और कोई भी त्यौहार हो हर आयु वर्ग का उसमे बराबरी का योगदान होता है।

कुल मिला कर त्यौहार का आनंद और तैयारी छोटे से लेकर बड़े तक करते है। और यही एकता और संगठन का पाठ हम जन्म से ही सीखते आ रहे है।

निमाड़ का कोई भी त्यौहार हो संगठन की शक्ति को दर्शाता है।

होली उत्साह और खुशी के रंगों का त्यौहार है । होली पर्व की तैयारी एक माह पूर्व से आरंभ हो जाती है।

माघी पूर्णिमा के दिन जिस स्थान पर होली का दहन होता है वहाँ पूजा कर शुभ मुहूर्त में एक डंडा गाड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये डंडा भक्त प्रहलाद का प्रतिक होता है।

जो कि होली दहन के पूर्व इसे निकाल लिया जाता है।

पर मेरे विचारों से ये हमे एक माला में पिरोने का काम भी कर देता है। ओर ये डंडा जो कि प्रतिक होता है पर्व का ओर एकता की शक्ति का।

छोटे थे तब कभी ये विचार नही आया कि हमारे बुजुर्गों ने ये नियम क्यो बनाया है।

मगर आज जब हम सब को अपने अपने विचारों के साथ बिखरे हुवे देखते है तो ये अहसास होता है कि ये नियम कितने उचित ओर शिक्षाप्रद है।

एक डंडा जो समूह नेतृत्व का प्रतीक है ।और सब उस नेतृत्व में कार्य करते है। हमने बचपन से यही सब देखा है।

और बड़े उत्साह से ओर जोरो शोरो से बच्चे अपने समूह के साथ लकड़ियां ढूढने में लग जाते है। एक होड़ सी रहती है कि पड़ोस के मोहल्ले से बड़ी हमारी होली होना चाहिये।

ओर इसी बीच कब बच्चे संगठन का पाठ पढ़ लेते थे ये कोई नही जान पाता था। सब के प्रयत्न से कैसे जीत हासिल की जाती है । ये वो सहज ही सिख जाते थे।अपने कार्य को सफलता पूर्वक करना । एक समूह को संचालित करना ।

और सब एकमत हो कर चलना सिख जाते थे। इस बीच एकदूसरे की आवश्यकताओ का भी पूरा पूरा ध्यान रखते थे। होली का एक डंडा मानव सभ्यता को एकता का पाठ पढ़ा देता है क्यो ।कभी सोचा है।

इसलिए कि हम स्वयम उस एकता के सूत्र में बंधने के लिये तैयार है। और आज का सच ये है कि हम इस तरह की शिक्षा का सहारा लेते है। ये कह कर की ये एकता का संगठन का पाठ पढ़ाएगी ।

मगर ये किस हद तक सहायक है। जब आप स्वयम ही इस सूत्र में बंधने को तैयार नही है तो फिर कोई कितना भी प्रयत्न करले नही बांध सकता है आपको ।

एक लकड़ी का मुक टुकड़ा बिना बोले सब को इकठ्ठा कर लेता है तो हम तो मानव है फिर भी ये कह देते है कि बहोत प्रयत्न किया पर कोई जुड़ता नही । कभी हमने ये सोचा कि उस संगठन ,जोड़ने के पीछे उद्देश्य क्या रहा।अगर स्वयम को शक्तिशाली बताना है तो कोई नही जुड़ेगा ।

सब को साथ लेकर चलना है तो सब आकर जुड़ेंगे। जिस तरह होली का एक डंडा अपने कुशल नेतृत्व में कुछ ही दिनों में सब को एकता का पाठ पढ़ा कर स्वयम का आकार तो बड़ा कर ही लेता है। मानव जाति को भी एकता के सूत्र में बांध देता है।

तो ये होली का डांडा या नेतृत्व की छड़ी है । अब हम इसे कैसे भी समझे ।

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About अनामिका आलोक अत्रे 3 Articles
अनामिका आलोक अत्रे खण्डवा । मेरा अपना साड़ियों का बिजनेस है। कॉटन कलेक्शन । ओर सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी हुई हु । कई वर्षो से। मेरा अपना एक समूह है। 300 महिलाओ का जो कई तरह की सामाजिक गतिविधियो में शामिल रहती है। मेरा एक ही उद्देश्य है । कि समाज की वे महिलाये जो कई तरह के गुणों से सुसज्जित है। उन्हें अपने गुणों के साथ समाज , परिवार में एक उचित स्थान मिले। और इस कार्य मे मुझे निरन्तर सफलता मिल रही है। मैं साहित्य में रुचि रखती हूं। और इसी लिये मेरे हर लेख में प्रकृति से ली गई एक सिख होती है। जो समाज को एक नई सोच देती है। समय के साथ विचारों का सकारात्मक परिवर्तन समाज के हर वर्ग को अपना एक निश्चित स्थान देता है।
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