होली – रंगीन धूलिवंदन

होली का महत्व

फाल्गुन माह का फाग भरा रस सबको छूकर गुजरा है।

होली के रंगों के साथ साथ प्रेम के रंग में रंग जाने की चाह ईश्वर को है तो भक्त को भी है, फिर प्रेमी को है तो प्रेमिका को भी।

मीरा के इस पद में देखिए-

रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी, री।।
उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकाँ उडावां रंग रंग री झरी, री।।
चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरां दासी गिरधर नागर, चेरी चरण धरी री।।

मीरा अपनी सखि को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि, “

हे सखि मैं ने अपने प्रियतम कृष्ण के साथ रंग से भरी, प्रेम के रंगों से सराबोर होली खेली। होली पर इतना गुलाल उडा कि जिसके कारण बादलों का रंग भी लाल हो गया। रंगों से भरी पिचकारियों से रंग रंग की धारायें बह चलीं। मीरां कहती हैं कि अपने प्रिय से होली खेलने के लिये मैं ने मटकी में चोवा, चन्दन, अरगजा, केसर आदि भरकर रखे हुये हैं। मीरा कहती हैं कि मैं तो उन्हीं गिरधर नागर की दासी हूँ ।

महाकवि सूरदास सूरदास जैसे नेत्रहीन कवि भी फाल्गुनी रंग और गंध की मादक धारों से बच न सके और उनके कृष्ण और राधा छेडख़ानी भरी होली खेलते हैं।

हरि संग खेलति हैं सब फाग।

होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है।

होली का महत्व

होली उत्सव सम्पूर्ण देश में आनन्द और उत्साह से मनाया जाता है।इसका आरंभिक शब्द रूप होलाका था।

होला एक कर्म विशेष है, जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए संपादित है।इस कार्य में राका पूर्ण चंद्रमा है।

फाल्गुन की पूर्णिमा पर लोग शृंग से एक दूसरे पर रंग छोड़ते हैं और सुगंधित द्रव्य बिखेरते हैं।

लिंग पुराण में फाल्गुन पूर्णिमा को फाल्गुनिका कहा गया है यह लोगों को विभूति या ऐश्वर्य देने वाली है।

होली से सम्बंधित हमारी पौराणिक कथाओं में प्रमुख है शिव द्वारा कामदेव के दहन की कथा।

दूसरी हिरण्यकश्यपु की भगिनी होलिका की कथा, और तीसरी भविष्य पुराण में (132/1/51) प्राप्त होती है।

इसमें युधिष्ठिर ने फाल्गुन पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले रीति-रिवाजों के विषय में जब श्रीकृष्ण से पूछा तो कृष्ण ने उन्हें राजा रघु के विषय में एक किवदंती सुनाई।

राजा रघु के पास प्रजा परेशान होकर गई और कहा कि ढोण्ढा नामक राक्षसी बच्चों को डराती है।

राजा ने अपने पुरोहितों से पूछा तो उन्होंने बताया कि मालिन की पुत्री राक्षसी को शिव से वरदान प्राप्त है कि उसे देव, मानव आदि नहीं मार सकते, ना अस्त्र-शस्त्र, जाड़ा, गर्मी और वर्षा।

किंतु, शिव ने इतना कह दिया कि क्रिड़ायुक्त बच्चों से भय खा सकती है।

शीत ऋतु के समाप्ति व ग्रीष्म के आगमन का समय फाल्गुन पूर्णिमा को होता है। इस दिन बच्चे इसे आनंद से मनाएं।

बच्चे लकड़ी के टुकड़े लेकर अग्नि की तीन बार प्रदिक्षिणा करें, हंसे और खुश होकर शोरगुल करे तो वह राक्षसी मृत्यु को प्राप्त होगी। इसी कारण से इस उत्सव को अडाडा या होलिका कहा गया है।

होली का पर्व बहुआयामी है। इस दिन समाज से ऊंच-नीच, गरीब-अमीर जैसी विभाजक भावनाएं विलुप्त हो जाती हैं। यह पर्व खेती-किसानी से भी जुड़ा है इसीलिए तो जलती होली में गेहूं की बालियों को भूनने का महत्व है।

होली दहन

होली उत्साह और उमंग से भरा त्योहार और उत्सव है। विष्णु भक्त इस दिन व्रत भी रखते हैं।

होलिका दहन के लिए लोग महीनेभर पहले से तैयारी में जुटे रहते हैं।

सामूहिक रूप से लोग लकड़ी, उपले आदि इकट्ठा करते हैं और संध्या काल में भद्रा दोषरहित समय में होलिका दहन किया जाता है।

होली जलाने से पूर्व उसकी विधि-विधान सहित पूजा की जाती है और अग्नि एवं विष्णु के नाम से आहुति दी जाती है।

होलिका दहन के दिन पवित्र अग्नि के चारों ओर लोग नृत्य करते हैं और लोकगीत का आनंद लेते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान भोलेनाथ से हो जाए परंतु शिवजी अपनी तपस्या में लीन थे।

तब कामदेव पार्वती की सहायता के लिए को आए।

उन्होंने प्रेम बाण चलाया और भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई।

शिवजी को बहुत क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी।

जब भगवान शिव की तपस्या भंग हुई तो क्रोध में उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया।

कामदेव का शरीर उनके क्रोध की ज्वाला में भस्म हो गया।

फिर शिवजी ने पार्वती को देखा।

कथा के अनुसार यह फाल्गुन शुक्ल अष्टमी का दिन था।

इसके बाद कामदेव की पत्नी रति ने उनके अपराध के लिए शिवजी से क्षमा याचना कर कामदेव को पुनर्जीवन देने की प्रार्थना की।

तब भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन देने का आश्वासन दिया।

पार्वती की आराधना सफल हुई और शिव जी ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

इसीलिए पुराने समय से होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकात्मक रूप से जला कर अपने सच्चे प्रेम का विजय उत्सव मनाया जाता है।

जिस दिन भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था वह दिन फाल्गुन शुक्ल अष्टमी थी।

तभी से होलाष्टक की प्रथा आरंभ हुई।

होलाष्टक होली दहन के पूर्व के आठ दिन माने जाते हैं।

इस दिन राधा-कृष्ण की लीलाओं एवं ब्रज की होली की धुन गलियों में गूंजती रहती है और लोग आनंद-विभोर रहते हैं।

होलिका दहन के दिन लोग अपने-अपने घरों में खीर और मालपुआ बनाकर अपनी कुलदेवी और देवता को भोग लगाते हैं।

भक्त प्रहलाद की कथा

होलिका दहन से सम्बंधित प्राचीन कथा है कि दीति का पुत्र हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से घोर शत्रुता रखता था।

इसने अपनी शक्ति के घमंड में आकर स्वयं को ईश्वर कहना शुरू कर दिया और घोषणा कर दी कि राज्य में केवल उसी की पूजा की जाएगी।

उसने अपने राज्य में यज्ञ और आहुति बंद करवा दी और भगवान के भक्तों को सताना शुरू कर दिया।

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था।

पिता के लाख कहने के बावजूद प्रहलाद विष्णु की भक्ति करता रहा।

असुराधिपति हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को मारने की भी कई बार कोशिश की, परंतु भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते रहे और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ।

हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती।

हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे।

आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया।

ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है।

होलिका दहन के दिन एक पवित्र अग्नि जलाई जाती जिसमें सभी तरह की बुराई, अंहकार और नकारात्मकता को जलाया जाता है।

धूलिवंदन: राग-रंग

होलिका दहन के दूसरे दिन को धुलेंडी,धुरेड्डी,धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है।

यह प्रमुखता से भारत तथा नेपाल के अलावा अन्य देशों में धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

धुलेंडी या धूलिवंदन के दिन लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं।

ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं।

राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है।

राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं , इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है।

खेतों में सरसों खिल उठती है। फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है।

प्रकृति में चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।

गुझिया ,कांजी होली का प्रमुख पकवान है जो कि मावा (खोया) और मैदा से बनती है और मेवाओं से युक्त होती है।

पूरणपोली भी बनाई जाती है।

होली की शाम को लोग एक दूसरे के घर होली मिलने जाते है।

जहाँ उनका स्वागत गुझिया, नमकीन व ठंडाई से किया जाता है।

होली के दिन आम्र मंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा माहात्म्य है।

Photo by Tom Watkins on Unsplash

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About विभा भटोरे 9 Articles
श्रीमती विभा भटोरे, इंदौर स्नातकोत्तर -कार्बनिक रसायन शास्त्र (बी एड) अध्यन अध्यापन में विशेष रुचि। साहित्य सृजन का शौक है, निमाड़ी बोली संस्कृति और संस्कार के संरक्षण हेतु प्रयासरत।साझा संकलन शब्द समिधा प्रकाशित।
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Kavita pagare
Kavita pagare
7 months ago

बहुत ही बढ़िया

श्रीमती विभा भटोरे
श्रीमती विभा भटोरे
6 months ago
Reply to  Kavita pagare

धन्यवाद

अनुमिता
अनुमिता
7 months ago

बहुत बढ़िया होली वर्णन…

श्रीमती विभा भटोरे
श्रीमती विभा भटोरे
6 months ago

बहुत धन्यवाद।