गुरु ग्रंथन का सार

गुरु ग्रंथन का सार

गुरु ग्रंथन का सार है, गुरु है प्रभु का नाम,
गुरु आध्यात्म की ज्योति है, गुरु है चारों धाम।

प्रिय पाठक वृंद,

मानव की लिए आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वयं की इन्द्रियों को क्रियाशील रखना अनिवार्य है।

दर्शन, श्रवण, अध्ययन, चिंतन एवं मनन, इन सभी तत्वों का ज्ञान होना आवश्यक है।

हम शोध के द्वारा भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही प्रकार के तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

हमें हमारे जीवन में भौतिक तत्वों का ज्ञान तो सरलता पूर्वक प्राप्त हो जाता है परंतु, आध्यात्मिक ज्ञान हमें गुरु या गुरु भक्ति के द्वारा ही प्राप्त होता है।

हम अपने प्राचीन ग्रंथों को स्वयं पढ़कर भी ज्ञान अर्जित कर सकते हैं।

उन्हें पढ़ते समय हमें गुरु वाणी की अनुभूति होना चाहिए।

गुरु शिष्य की परिकल्पना में एक आदर्श शिष्य के रूप में एकलव्य का दृष्टांत सदैव हमारे सामने रहता है; जिन्होंने सिद्ध कर दिया था कि किसी भी शिक्षा को प्राप्त करने के लिए गुरु का शारीरिक रूप से उपस्थित होना जरूरी नहीं है।

एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की मूरत बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास किया था।

इसी प्रकार हम भी गुरु की पवित्र वाणी को मन में धारण कर वेदों एवं उपनिषदों का मन से अध्ययन कर सकते हैं।

गुरु के साथ ही साथ हम क्यों ना विद्यार्थियों पर भी एक नजर डालें।

कोविड 19 का हमारे देश की आर्थिक स्थिति पर तो प्रभाव हुआ ही है परंतु मेरी दृष्टि में सबसे अधिक प्रभावित हुई है, शिक्षा व शिक्षा का स्वरूप।

बच्चों को एक उन्मुक्त और गतिशील वातावरण की आवश्यकता होती है परन्तु ,इस त्रासदी के रहते बच्चों का बचपन का कुछ समय घर की चार दीवारों के अंदर ऑन लाइन स्क्रीन पर सिमट कर रह गया है।

छोटे बच्चों का स्कूल यूनिफार्म में लगभग तीन से चार घण्टे तक स्क्रीन के समक्ष बैठकर पढ़ना मजबूरी हो गई है।

बच्चों का मानसिक एवं शारीरिक विकास ठहर सा गया है।

स्वामी विवेकानंद जी वेदों की शिक्षा एवं पाश्चात्य शिक्षा दोनो को साथ-साथ ही आगे ले जाना चाहते थे।

शिक्षा के प्रति वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते थे।उनके शैक्षिक विचारों में उत्तम कोटि की बौद्धिकता एवं उसकी गहराई है।उनका मानना था

“शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”

हमारे देश के वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम जी का मानना था कि,

अंततः वास्तविक अर्थों में शिक्षा सत्य की खोज है। यह ज्ञान और आत्मज्ञान से होकर गुजरने वाली एक अंतहीन यात्रा है।”

वे कहते थे,

“किसी विद्यार्थी की सबसे जरूरी विशेषताओं में से एक है प्रश्न पूछना, विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने दीजिए।”

साहित्य क्षेत्र के उच्च कोटि के साहित्यकार एवं उपन्यास के सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी का कहना है

“जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति ना मिलें हम में गति और शक्ति ना पैदा हो हमारा सौंदर्य प्रेम ना जागृत हो,

जो हम में संकल्प और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे,

वह हमारे लिए बेकार है, वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।”

“जीवन में सफल होने के लिए आपको शिक्षा की जरूरत है न कि साक्षरता और डिग्री की”

कथा जगत के सूर्य को नमन करूँ मैं आज जिनको पढ़कर हो रहा विकसित आज समाज।

आभार, सम्पादिका डा. भावना बर्वे

विषय प्रेरणा

१. गुरु पूर्णिमा ( २४ जुलाई २०२१ )
२. स्वामी विवेकानंद पुण्यतिथि ( ४ जुलाई १९०२ )
३. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम पुण्यतिथि ( २७ जुलाई २०१५ )
४. मुंशी प्रेमचंद जन्म दिवस ( ३१ जुलाई १८८० )

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About डॉ. भावना बर्वे 8 Articles
संपादक, शब्दबोध पी. एच .डी., एम. ए.,बी.एड.,डिप्लोमा इन फैशन डिज़ाइनिंग लगभग 20 वर्षो तक शिक्षण कार्य का अनुभव,हस्तकला एवं पाक कला के शैक्षणिक कार्य मे 25 वर्षो से संलग्न
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विभा गावशिंदे
विभा गावशिंदे
3 months ago

बहुत सुंदर