बौद्धिक विकास में सहायक किताबें

किताबें

पाठक वृन्द
नर्मदे हर !

कहा जाता है कि बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं; उन्हें जैसा हम ढालेंगे वो वैसा ही बनेंगे।बच्चे जब बोलना भी नहीं सीखते, तब से ही वह रंगीन पुस्तकों की ओर आकर्षित हो जाते हैं।

पढ़ने की आदत को बच्चों की दिनचर्या में शामिल करें:

हम उन्हें बचपन से ही अच्छी आदतें सिखाना आरंभ कर देते हैं।इन्हीं अच्छी आदतों में से एक आदत है पढ़ना, बच्चों में पढ़ने की आदत उनके मानसिक विकास में सहायक होती है।जब वे रंगीन चित्रों से भरी हुई पुस्तकों की ओर आकर्षित होते हैं तब उन्हें उचित समय दें। आपने कई बार देखा होगा कि बच्चे बड़ों का अनुकरण करते हैं ,वे जब भी अपने बड़ों को समाचार- पत्र पढ़ते देखते हैं तो स्वयं भी उनकी नकल उतारते हैं।

पढ़ने एवं पढ़ाने की क्रिया में रुचि:

बच्चों को अभिनय द्वारा कहानियाँ अवश्य सुनाए, जिससे उनकी एकाग्रता बढ़ेगी।बच्चा आपकी नकल करते हुए शब्दों के उच्चारण निकालने का प्रयत्न भी करेगा।जब वह आपकी कहानी सुनेगा तब उसकी कल्पना शक्ति विस्तृत रूप लेने लगेगी। वह कहानी को याद रखने का प्रयत्न भी करेगा, जिससे बच्चों की स्मरण शक्ति सक्रिय होकर विकसित होने लगेगी।बच्चों को किसी अवसर पर उपहार स्वरूप पुस्तकें अवश्य दें।

साहित्यकार धर्मवीर भारती जी द्वारा लिखा हुआ संस्मरण “मेरा निजी पुस्तकालय” अवश्य पढ़ें, संस्मरण में उन्होंने पुस्तकों के महत्व को समझाया है।

बच्चों के साथ आप भी पढ़ें:

बच्चों को साथ लेकर पढ़ने की आदत डालें ,धीरे -धीरे वे स्वतः पुस्तक पढ़ने लगेंगे।पढ़ने के लिए घर मे एक कोना विशेष रूप से तैयार करना चाहिए ,जहां उजाला भरपूर हो।सप्ताह के अंत में बच्चों के मनोरंजन हेतु कभी -कभी उन्हें पुस्तकालय भी ले जाना चाहिए, जिससे बच्चे पुस्तकों की विविध शैलियों से परिचित होंगे।

पढ़ने से विकसित होने वाले मनोवैज्ञानिक गुण:

वर्तमान समय में ऑनलाइन पढ़ाई से बच्चों पर कुछ भिन्न प्रभाव पढ़ रहा है, जिससे वे पुस्तकों से दूर होकर e reading की ओर जा रहे हैं ; मुख्य बात है कि वो पढ़ रहा है।पढ़ने की प्रक्रिया से बच्चों में मनोवैज्ञानिक रूप से कई गुणों का विकास होता है।ज्ञान के भंडार में व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व को बदलने की ताकत होती है।

पढ़ने की प्रक्रिया से संवादों को उचित रूप से बोलने की आदत आत्मविश्वास का निर्माण करती है, और साथ ही जिज्ञासा जैसे भावों को भी जन्म देती है।पढ़ने की प्रक्रिया से शब्दावली में विकास होता है और साथ ही साथ सहानुभूति, आनन्द या इसी तरह और भी कई भावों का संचार होता है। पढ़ने की शैली से रचनात्मक क्षमता का विकास होता है, साथ ही अपने मन एवं शरीर पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

जब हम पढ़ने में तल्लीन हो जाते हैं, तब लगनशीलता का स्वतः विकास होने लगता है।पढ़ने की क्रिया कभी -कभी प्रेरणादायी भी बन जाती है और हमें कुछ नया सीखा जाती है।

उपरोक्त मनोवैज्ञानिक गुणों के साथ- साथ पढ़ने की प्रक्रिया हमें सामाजिक भी बनाती है और तनाव को भी कम करती है। पठन क्रिया का अनुभव हमें आंतरिक रूप से समृद्ध करता है,अतः नए विचारों को जीवन में खिड़की से आने वाली हवा की तरह आने दीजिए।

पठन पाठन करें सभी नव रसों के संग,
इंद्रधनुषी रंगों की है छटा यहाँ कथा कविता के संग।

आभार, सम्पादिका डा. भावना बर्वे

Photo by Element5 Digital on Unsplash

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About डॉ. भावना बर्वे 8 Articles
संपादक, शब्दबोध पी. एच .डी., एम. ए.,बी.एड.,डिप्लोमा इन फैशन डिज़ाइनिंग लगभग 20 वर्षो तक शिक्षण कार्य का अनुभव,हस्तकला एवं पाक कला के शैक्षणिक कार्य मे 25 वर्षो से संलग्न
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Kalpana Upadhyay
9 months ago

Bahut Sundar sampadak ki hai aur bahut badhiya Prayas Patrika bahut Sundar hai Dhire Dhire padhna hoga bahut Achcha ke Bhavna bahut Achcha Prayas bahut shandaar !👌👌👍🙏

पायल चौरे
पायल चौरे
9 months ago

।।वाह बहुत खुब।।

Mohan गावशिन्दे
Mohan गावशिन्दे
9 months ago

सच है कि आज बौद्धिक पठन पाठन से दूर हो गए हैं , हाँ, मोबाइल, लेपटॉप पर सामयिक पठन पाठन होता रहता है , यूँ तो आज की युवा पीढ़ी का बौद्धिक स्तर उच्चतम स्तर पर है गर्व है हमें इस बात का। परन्तु पश्चिम देशों के जॉब के कारण वे पश्चिमी संस्कृति को अधिक अच्छे से जानने समझने लगे हैं, ये भी अच्छी बात है, परन्तु हमारी सनातन एवम वैज्ञानिक संस्कृति से परे होते जा रहे थे। ऐसी परिस्थिति में “शब्दबोध” का सांस्कृतिक विरासत को भावनात्मक, शिक्षाप्रद एवम वैज्ञानिक आधार के साथ डिजिटल प्रकाशन सुखद अनुभूति प्रदान कर रहा है , साधुवाद 🙏🌹💖💝