ठहराव या फैलाव

ठहराव

दोनो शब्दो को हम समझे तो दोनो के अर्थ भिन्नता लिए हुवे है।

जहाँ एक सीमित ओर रुका हुआ है तो दूसरा खुद का विस्तार किये हुवे है।

कल हम बच्चो के साथ हनुमंतिया घूमने गए ।

जो कि पर्यटन स्थल है। और बेकवाटर किनारे बना हुआ है।

प्रकृति की सुंदरता देखते बनती है। जिधर नजर जाती पानी ही पानी नजर आता है।

विशालता को लिए पानी सब को आकर्षित कर रहा था।

हजारों की संख्या में लोग पानी को देख रहे थे।

कोई नदी तो कोई समुंदर तो कोई उसकी विशालता को महासागर कह कर सम्बोधित कर रहा था।

मैं सोच रही थी, कि ये ठहरा हुआ पानी इन उपमाओं से कितना प्रसन्नचित हो रहा होगा।

और अपनी गहराई की तह तक खुश हो रहा होगा।

वही मन ही मन उदास भी हो रहा होगा ।

कि जिन नामो की उसे उपमा दी जा रही है।

वो उनकी तरह बह नही सकता, समुद्र की तरह बड़ी बड़ी लहरों के साथ खेल नही सकता।

मगर फिर भी उसने हार नही मानी वो रुका नही।

और न ही किसी पर दोषारोपण किया।

खुद ने अपना रास्ता खोजा ।

जहाँ था वही पर उसने अपना विकास ( फैलाव )किया।

और आज अपना विशाल क्षेत्रफल फैला लिया है।

ये उसकी अपनी खुद को कभी भी कमजोर और किसी से कम न समझने की आत्म शक्ति का परिणाम है।

जब मन से चंचल कभी न रुकने वाले पानी को हम बांध देते है।

तो वो कभी विरोध या शिकायत नही करता बल्कि वो हर परिस्थिति को स्वीकार करते हुवे ।खुद को आगे बढ़ाता है।

तो फिर हम इंसान क्यों ढिंढोरा पीटते है?

की परिस्थितियां हमारे अनुकूल नही थी वरना आज हम कामयाब होते।

हम क्यों नही उस ठहरे हुवे पानी की तरह जैसी भी परिस्थितियां हो खुद को आगे लेकर जाने की सोच क्यों नही रखते?

क्यों समाज ,परिवार, देश, सब को दोष लगाते रहते है।

ठहरे हुवे आप हो थोड़े हाथ पांव अपनी सोच को फैला कर तो देखिये। दूर तक कोई नही है।

सब आप का ही है। और सब फिर आप को ही देखेगे।

इसलिये जहाँ ठहराव आता है। तो आप समझ जाइये की आप को वही से विस्तार( फैलाव ) करना है।

और खुद को साबित करना है।

इसलिए जीवन के ठहराव को आप विस्तार ( फैलाव )की नजर से देखे।

image curtesy Madhya Pradesh Tourism

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अनामिका आलोक अत्रे 3 लेख
अनामिका आलोक अत्रे खण्डवा । मेरा अपना साड़ियों का बिजनेस है। कॉटन कलेक्शन । ओर सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी हुई हु । कई वर्षो से। मेरा अपना एक समूह है। 300 महिलाओ का जो कई तरह की सामाजिक गतिविधियो में शामिल रहती है। मेरा एक ही उद्देश्य है । कि समाज की वे महिलाये जो कई तरह के गुणों से सुसज्जित है। उन्हें अपने गुणों के साथ समाज , परिवार में एक उचित स्थान मिले। और इस कार्य मे मुझे निरन्तर सफलता मिल रही है। मैं साहित्य में रुचि रखती हूं। और इसी लिये मेरे हर लेख में प्रकृति से ली गई एक सिख होती है। जो समाज को एक नई सोच देती है। समय के साथ विचारों का सकारात्मक परिवर्तन समाज के हर वर्ग को अपना एक निश्चित स्थान देता है।
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