अन्नदाता का सम्मान

अन्नदाता का सम्मान होना चाहिए

अन्नदाता का सम्मान होना चाहिए 

धरती को सर्वस्व मानकर
अपना सर्वस्व न्यौछावर करता
रात-दिन ही सेवक बनकर
धरणी का हर क्षण मान बढ़ाता
अत: अन्नदाता का सम्मान ……

वसुधा को पसीने से सिचिंतकर
हर कोने को उर्वर है कर जाता
अन्नदाता बन भी भूखा रहकर
सारे जग की भूख मिटाता
अत:अन्नदाता का सम्मान ……

पूष की रात हो या ज्येष्ठ दोपहरी
वह हर पल सेवा में तत्पर रहता
खुद ही दीन-हीन रह जाता है
पर जग को खुशियों से भर देता
अत: अन्नदाता का सम्मान ……

कृषकाय काया, वस्त्रहीन होकर
सदियों से शोषित होते ही आया
धरणी को धानी से सज्जित कर
खुद ही मन में पुलकित हो जाता
अत: अन्नदाता का सम्मान ……

देश के अर्थ का आधार बनकर
खुद ही अर्थहीन होकर जीता
बढती खुशहाली में खुश होकर
निज कष्टों को क्षण भर में भूलता
अत: अन्नदाता का सम्मान ……

निज कर्तव्य जान-समझकर हमें 
इनके दुःख-कष्टों को हमें मिटाना है
काट भेदभाव-शोषण की निष्ठुरता
इनको समुचित अधिकार दिलाना है 
अत: अन्नदाता का सम्मान ……

अत: अन्नदाता का सम्मान होना चाहिए 

Image by Shree Vallabh from Pixabay

और कविताएँ पढ़ें : हिंदी कविता

डॉ. आशा शरण 3 लेख
डॉ.आशा शरण, खंडवा शिक्षा: एम.ए.हिंदी,संस्कृत,समाजशास्त्र,राजनीतिशास्त्र,पीएच.डी., नेट,बी.एड.,पी.जी.डी.सी.ए. रुचि: लेखन, संगीत सुनना, सामाजिक कार्य में संलग्न रहना, हिन्दी काव्य कोश, कविता कोश और मीन गूंज में कविता प्रकाशित
3 1 वोट
लेख की रेटिंग
guest
0 टिप्पणियां
इनलाइन प्रतिक्रिया
सभी टिप्पणियाँ देखें