कंजूस बुढ़िया और शिकारी की खिचड़ी की कहानी

मैं भी अपने बचपन की एक कहानी सुनाती हूँ एक बार एक शिकारी शिकार करते हुए बहुत दूर निकल गया रात हो गई थी आसपास देखा एक झोपड़ी नजर आ रही थी वहां एक बुढ़िया रहती थी शिकारी ने बुढ़िया से पूछा क्या मैं यहां रात को सकता हूँ बुढ़िया बोले ठीक है।

अब शिकारी के पास खाने को कुछ नहीं था उसे भूख लग रही थी लेकिन बुढ़िया बड़ी कंजूस थी उसने पहले ही बोल दिया था सिर्फ रुक सकते हो बाकी मेरे पास खाने को कुछ नहीं है। शिकारी ने बोला कोई बात नहीं आप मुझे एक तपेली थोड़ा सा पानी दे दीजिए और बुढ़िया ने दे दिए उसने लकड़ियाँ इकट्ठा कर चूल्हा जलाया तपेली में थोड़ा पानी डाला फिर अपने पास जो कुल्हाड़ी थी उसे धो कर पानी में डाल दिया अब पानी उबलने लगा बुढ़िया पूछने लगी क्या बना रहे हो शिकारी बोला कुल्हाड़ी का शोरबा।

अब बुढ़िया बड़ी उत्सुक थी कैसे बनेगा शिकारी ने कहा थोड़ी सी दाल मिल सकती है क्या बुढ़िया झट से अंदर गई और थोड़ी दाल ले आई थोड़ा उबाल आने के बाद शिकारी बोला थोड़ा नमक मिर्ची मिल जाता तो आनंद आ जाता बुढ़िया ने सोचा ठीक है दे देती हूँ कुछ देर बाद शिकारी बोले थोड़े चावल मिल जाते तो शोरबा जोरदार बनता बुढ़िया ने कहा ठीक है चावल में दे देती हूँ इस तरह शिकारी ने बढ़िया खिचड़ी तैयार कर ली उसमें से कुल्हाड़ी निकाल ली।

अब बुढ़िया से कहा आप दो थाली ले आइए खिचड़ी थाली में डालकर बोले इसमें अगर थोड़ा थोड़ा भी हो जाता तो बहुत स्वादिष्ट लगती अब बुढ़िया घी भी ले आती है दोनों मिलकर खूब मजे से खाते हैं।