अलसाये जंगलों में पलाश की कली के खिलने, पतझड़-शाखों पर बसन्त की कोपल, बंजर भूमि में मखमली छादर-सा पसरा पलाश, और चारों ओर फैलती फगुनाई खुशबू/चारों ओर के उल्लास का काव्यात्मक चित्रण।
“प्रलय सूक्ति” में संसार के भयावह अंत, देवताओं के मिटने और मनुष्यों की चिताओं के उठने, धरा के नष्ट होने तथा भय, क्षुब्धता और अंधविश्वास के फैलाव का काव्यात्मक चित्रण है।
इस कविता में महाबली हनुमान की भक्ति, शक्ति और रामभक्त स्वरूप का वर्णन है—उनके पराक्रम, सीताजी की खोज और भक्तों पर कृपा की भावना को गीतात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यह कविता सही-गलत की उलझनों, ग्रंथ पढ़ने की बजाय सच्ची भक्ति, मंदिर-मस्जिद की दिखावटी आस्था और दीन-हीन की उपेक्षा जैसे पाखंडों पर सवाल उठाती है। इसमें गुरु के बिना प्रभु-प्राप्ति और प्रतिमा-पूजा के दिखावे पर भी तीखा संदेश है।
“श्रीराम जय राम जय जय राम” के समर्पण भाव में लिखी गई यह भक्ति कविता प्रभु श्रीराम के जन्म, तप-त्याग, वनवास, भक्त-कल्याण और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करती है।