पलाश-फूल और वसंत-उन्माद: एक कविता

अलसाये जंगलों में पलाश की कली के खिलने, पतझड़-शाखों पर बसन्त की कोपल, बंजर भूमि में मखमली छादर-सा पसरा पलाश, और चारों ओर फैलती फगुनाई खुशबू/चारों ओर के उल्लास का काव्यात्मक चित्रण।

कविता: शांत रस में मुरलीधर कान्हा की आराधना

यह कविता “शांत रस” में मुरलीधर कान्हा/गिरधारी के प्रति समर्पण, प्रतीक्षा, विश्वास और अंतिम क्षण की विनती व्यक्त करती है।

श्रृंगार: काव्य

“विषय--श्रृंगार” शीर्षक के अंतर्गत रचे गए इस काव्य में नायिका के सौंदर्य, अलंकार, प्रेम-सूक्त और मधुर भावों का वर्णन किया गया है।

भक्ति कविता: तुम मार्ग मेरा प्रशस्त करो

“तुम मार्ग मेरा प्रशस्त करो” भाव से रचित भक्ति-कविता, जिसमें प्रभु से शीत-हरण, संताप-हरण और मोह-लोभ से मुक्ति की प्रार्थना है।

प्रलय सूक्ति: महाभय और प्रलय का काव्य

“प्रलय सूक्ति” में संसार के भयावह अंत, देवताओं के मिटने और मनुष्यों की चिताओं के उठने, धरा के नष्ट होने तथा भय, क्षुब्धता और अंधविश्वास के फैलाव का काव्यात्मक चित्रण है।

हाथों से फिसलती रेत: धोखा और दूरी पर कविता

मीठी बातों के जाल, अपने-पराए होते रिश्तों, तपती गर्मी और जीवन में आती भयानक सुबह—इन सबके चित्रण में रचा गया यह काव्य।

महाबली हनुमान भजन: तात तोरे पवमान

इस कविता में महाबली हनुमान की भक्ति, शक्ति और रामभक्त स्वरूप का वर्णन है—उनके पराक्रम, सीताजी की खोज और भक्तों पर कृपा की भावना को गीतात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।

पाखंड पर करारा कटाक्ष: बिना गुरु कैसे पाएगा हरि?

यह कविता सही-गलत की उलझनों, ग्रंथ पढ़ने की बजाय सच्ची भक्ति, मंदिर-मस्जिद की दिखावटी आस्था और दीन-हीन की उपेक्षा जैसे पाखंडों पर सवाल उठाती है। इसमें गुरु के बिना प्रभु-प्राप्ति और प्रतिमा-पूजा के दिखावे पर भी तीखा संदेश है।

श्रीराम जय राम जय जय राम: भक्ति कविता

“श्रीराम जय राम जय जय राम” के समर्पण भाव में लिखी गई यह भक्ति कविता प्रभु श्रीराम के जन्म, तप-त्याग, वनवास, भक्त-कल्याण और सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करती है।

जिंदगी ऐसे चल रही जैसे शमा जल रही — कविता

जीवन के उतार-चढ़ाव, रोशनी और अंधेरे के बीच लगातार चलते रहने, अपनेपन और गैरों के साथ-साथ, और अंततः मौत के आगोश तक की भावनात्मक यात्रा पर आधारित कविता।