हाथों से फिसलती रेत: धोखा और दूरी पर कविता

रेत फिसल रही हाथों से।
थाम ले तु, मीठी बातों से।

अपने घर पराए हो गए।
सुनकर पराई, बातों से।

खिलकर खुशियाँ मुरझाई
तपते दिन औ गर्म रातों से

आई सुबह ऐसी, जीवन में
थी भयानक, जो रातों से ।

सहमें-सहमें से सब चेहरे
मेल मिलाप की बातों से।

अपना राग अलाप रहे हैं।
जाने किन किन बातों से।

जल गए जलाशय शीतांशु
जेठ सूरज की मुलाकातों से।

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