मर्यादा पुरुषोत्तम राम थे सबके घट – घट वासी,
पिता का वचन निभाने को जो बन गए संन्यासी।
माता कौशल्या की ममता भी रह गई थी प्यासी।
अयोध्यावासियों के मन में छाई थी गहरी उदासी।
कर भौतिक सुख का त्याग राम चले बन वनवासी,
राम संग लक्ष्मण, सीता भी बन गए थे वन के वासी।
त्याग देख इनका दुख से भर गए थे मिथिलावासी,
वापस ना आने तक सबकी रहेंगी अखियां प्यासी।
घास – फूस की बना कुटिया राम बने पंचवटी वासी,
कंद – मूल, फल खाकर रह रहे थे बन सन्यासी।
कुटिया में भी हो खुश रह रहे थे त्रिभुवनवासी,
सीता हरण को आया रावण बनकर कपटी सन्यासी।
सीता को पहले ही कर चुके थे सुरक्षित अविनाशी,
सौंपा था अग्नि देव को इस कारण ना थी उदासी।
सीता की प्रति छाया ही ले जा पाया वह कुशासी,
लंका विजय का ले प्रण निकल पड़े प्रभु अविनाशी।
हनुमान संग वानर सेना भी थी प्रभु दर्शन की प्यासी,
हृदय बिठाया हनुमान ने उनको जो थे घट -घट वासी।
दास बन नित दर्शन को रहती थी उनकी अखियां प्यासी,
पत्थरों का बना पुल वानर संग लंका पहुंचे अविनाशी।
देख राक्षस जाति का अंत खुश हुए सब संन्यासी,
कर दशानन का अंत सीता प्रतिरूप ले आए अविनाशी।
अग्नि देव से वापस पाकर सीता धन्य हुए त्रिलोकवासी,
चौदह वर्ष पूर्ण होने पर प्रसन्न भए सभी अयोध्यावासी।
स्वागत को झूमते गाते आए थे मिथिलावासी,
युगों युगों तक दीपोत्सव की खुशियां दे गए त्रिभुवन वासी।
हरदम जिनके दर्शन को रहती सबकी अखियां प्यासी,
ऐसे प्रभु राम को शत- शत नमन करते हैं हम भारतवासी।