दिव्य तेजस्वी माँ शक्ति को रूप दुर्गा की उत्पत्ति की कथा का अनुसार असुर रक्तबीज को अत्याचार खूब बड़ी गयो थो । कोई से भी वो मरी नी रयो थो, तब परेशान हुई न सब देवता ब्रह्माजी का पास गया । उनक अपणो दुःख सुणायो न उनक अपणी इनी परेशानी को हल पूछ्यो तब ब्रम्हाजी न कयो दैत्यराज क यो वर मिळेल छे कि ओकी मृत्यु कोई कुंवारी कन्या का हाथ सेज होयग , तवं सब देवता न न खूब सोच्यो असी पराकमी कन्या कुंण होयग जो इना शक्तिशाली दैत्य क मारी सकज । सब जगा ढूंढ्यो पण असी कोई कन्या नी मिली , तवं सबई देवता न न इकठ्ठा हुई न अपणा तेज से देवी का इना रूप क प्रकट कर्यो । अलग अलग देवता न का शरीर से निकल्या तेज से देवी का अलग अलग अंग बण्या।
भगवान शंकर का तेज से देवी को मुडो प्रकट हुयो , यमराज का तेज से माथा का बाल , विष्णु का तेज से हाथ , चंद्रमा का तेज से स्तन , इंद्र का तेज से कमर , वरुण का तेज से जांघ , पृथ्वी का तेज से नितंब , ब्रह्मा का तेज से चरण , सूर्य का तेज से दोई पाँव की ऊंगली न , प्रजापति का तेज से सारा दांत , अग्नि का तेज से दोई डोळा , संध्या का तेज से भौंह न , हवा का तेज से कान अरु दूसरा सब देवता न का तेज से देवी का अलग – अलग अंग बण्या ।
फिर शिवजी न उनी महाशक्ति क अपणो त्रिशूल दियो , लक्ष्मीजी न कमळ को फूल , विष्णु जी न चक्र , अग्नि न शक्ति न बाण न से भरेल तरकस , प्रजापति न स्फटिक मणि नकी की माळा , वरुण न दिव्य शंख , हनुमानजी न गदा , शेषनागजी न मणि न से सुशोभित नाग , इंद्र न वज्र , भगवान राम न धनुष , वरुण देव न पाश न तीर , ब्रह्माजी न चारई वेद न हिमालय पर्वत न सवारी का लेण शेर दियो ।
इनका अलावा समुद्र न खूब सारा उज्जवल हार , कदी नी फाटण वाळा दिव्य वस्त्र ( कपड़ा ), चूड़ामणि , दुई कुंडल , हाथ का कंगन , पाँव क चंपक अरु अंगुठी भेंट करी । इनी सब चीज न क देवी न अपणा अठारह हाथ न म धारण कर्या ।
मां दुर्गा इनी सृष्टि की आद्य शक्ति छे या आदि शक्ति छे । पितामह ब्रह्माजी , भगवान विष्णु जी न भगवान शंकरजी की शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति , पालण-पोषण न संहार होज । दूसरा देवता भी उनकी शक्ति से शक्तिमान हुई न सारो काम करज ।