एक और सावित्री
स्वरचित
रश्मि का छोटा सा परिवार, सास, ससुर, एक बारह साल का बेटा, पति रोहन और वह खुद। कुल मिलाकर पांच जने। मध्यम परिवार से आई थी, कोई बड़े बड़े सपने, अरमान नहीँ थे। हर स्त्री की चाह, कि घर गृहस्थी में आराम हो सुख चैन मिले, और वह सब कुछ रश्मि को मिला।
ससुरजी का सरकारी मिडिल स्कूल में प्राचार्य के पद से करीब पांच साल पहले रिटायरमेंट हुआ था। पति रोहन प्रायवेट जॉब में थे। रिटायरमेंट के पैसों से ससुरजी ने चार कमरों का सुविधायुक्त मकान भी बनवा लिया था।
दोपहर में किचन का काम निपटा रही थी कि अचानक डोरबेल बजी, रश्मि ने दरवाजा खोला तो सामने रोहन खड़े थे एक ऑफिस के व्यक्ति के साथ। असमय रोहन को आया देख मन में कई शंकाये उठने लगी। पता चला कि रोहन को अचानक चक्कर आ जाने से गिर पड़े थे इसलिये बॉस ने किसी के साथ घर भिजवाया था। रश्मि ने रिक्शा बुलवाया और डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर ने देखा और और दो तीन जाँच लिख दी, कल तक की दवाई दे दी।
दूसरे दिन सुबह सुबह ही रोहन को चक्कर आने और उलटियां शुरू हो गई। रश्मि ने घबराकर डॉक्टर को फोन किया, हॉस्पिटल ले गई और दौड़कर रिपोर्ट्स भी ले आई। रिपोर्ट को देखते हुये डॉक्टर के चेहरे को पढ़कर रश्मि भयभीत हो गई। डॉक्टर ने चिन्ता व्यक्त की, बताया कि किडनी में परेशानी है और पास के शहर में रेफर कर दिया।
रश्मि थोड़ी देर तो समझ भी नहीं पाई कि क्या करूँ, किससे कहूँ, जैसे पाला मार गया हो उसे। फिर रोहन को लेकर घर गई शहर जाने की तैयारी करने लगी। अपने पड़ोसी मुँहबोले भाई रमेश को सारी बात फोन पर ही बताई, और साथ चलने का आग्रह किया। बूढ़े सास-ससुर अलग परेशान कि क्या हुआ, रश्मि ने उन्हें समझा दिया कि कोई टेंशन वाली बात नहीं है। यहाँ हॉस्पिटल में आधुनिक सुविधाएं न होने से पास के शहर में इलाज के लिये ले जाने का कहा है।
आनन फानन में तैयारी की, पास में जमा पूंजी जो भी थी सब रख ली। अच्छी खासी राशि पास में थी जिसके सहारे बेटे के भविष्य के सपने बुना करती थी जो आज आड़े वक्त काम आ गई।
तीनों एक गाड़ी हायर करके शहर के हॉस्पिटल में पहुँच गये। डॉक्टर की पर्ची थी ही, फटाफट एडमिट कर लिया।
सारी जांच पड़ताल से पता लगा कि रोहन की किडनियां खराब हो चुकी है। जल्द से जल्द किडनी ट्रांसप्लांट की व्यवस्था नहीं हुई तो जान के लिये बहुत खतरा है, किडनी की व्यवस्था होने तक इंतजार करना पड़ेगा। सुनकर, मानों पाला मार गया हो।
रश्मि पर तो जैसे आसमान टूट पड़ा। भाई रमेश ने सांत्वना दी, कि बहन ईश्वर पर भरोसा रखो वही सब ठीक करेंगे।
रश्मि नें पति रोहन को कुछ नहीं बताया, पूछने पर बताया कि कुछ ही दिनों में छुट्टी मिल जाएगी कोई चिंता की बात नहीं है। रोहन को हल्का नाश्ता और चाय दी। दवाई देने से नींद आ गई।
रश्मि को सूझ नहीँ रहा था कि आगे क्या करना है और उसे क्या करना है, सोच में खोई रही।
अचानक उसने मन में कुछ निश्चय किया और भाई रमेश को बताया। क्षण भर तो रमेश भी अवाक देखता रहा, फिर उसने रश्मि के दृढ़ निश्चय को देखते हुये डॉक्टर के पास जाकर बात बताई कि रश्मि अपनी एक किडनी पति रोहन को देना चाहती है। डॉक्टरर्स टीम को कोई आपत्ति नहीं थी।
दूसरे दिन सारी कागजी कार्यवाही करके रश्मि भी एडमिट हो गई, ऑपरेशन पूर्णरूप से सफल रहा। डॉक्टरर्स टीम ने रश्मि को बधाई दी और उसके हौसले को सराहा।
कुछ दिन के बाद रोहन को छुट्टी मिल गई। रोहन को रमेश ने सारा वाकया बताया तो रोहन के दिल में रश्मि के लिये प्यार और कृतज्ञता थी। अपने गाँव जाते समय राह में बहुत सारी महिलाएं झुंड की झुंड पूजा करती हुई दिखी रोहन ने पूछा कि आज कौनसा त्योहार है, तो रश्मि ने बताया कि आज वट पूर्णिमा है और दोनो ही एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिये।
आज एक और सावित्री अपने सत्यवान को यमराज के हाथों से छुड़ाकर ले आई थी।
प्रभा शुक्ला, खरगोन