सही गलत के शोर में मन जो लिया उलझाय ,,
कैसे हरि को पाएगा , गुरू बिन कौन बताय ।।
स्वरग नरक तो यहीं धरे,, क्यूँ तू ग्रंथ पढ़ाए।।
मंदिर मस्जिद यूँ फिरे ,, रहा व्यर्थ बौराय !!!
सोने की मूरत रखे ,, रजत छत्र चढ़ाय ,
दीन हीन की सेवा से ,,क्यूँ तू भागा जाय।।
पशु को मारे सोटियाँ ,, मूरत दूध नहलाय,,
प्रभु की रचना छोड़ कर , मंदिर दियो बनाय ।।
—🎭वीणा विपुल🎭-