रेत फिसल रही हाथों से।
थाम ले तु, मीठी बातों से।
अपने घर पराए हो गए।
सुनकर पराई, बातों से।
खिलकर खुशियाँ मुरझाई
तपते दिन औ गर्म रातों से
आई सुबह ऐसी, जीवन में
थी भयानक, जो रातों से ।
सहमें-सहमें से सब चेहरे
मेल मिलाप की बातों से।
अपना राग अलाप रहे हैं।
जाने किन किन बातों से।
जल गए जलाशय शीतांशु
जेठ सूरज की मुलाकातों से।
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