जिंदगी ऐसे चल रही जैसे शमा जल रही — कविता

जिंदगी ऐसे चल रही जैसे शमा
जल रही
औरों को रोशनी दे खुद पिघल
रही
जिंदगी के उतार-चढ़ाव से बुझते बुझते
जल रही
कहीं रोशनी कहीं अंधेरा मंजिल की राहों से
गुजर रही
कभी अपनों का साथ कभी गैरों
का साथ
हाथ लिए हाथों में कई राह से
गुजर रही
पतझड़ हो या सावन फ़िज़ा में रंग
बिखेर रही
रंगीन है जिंदगी सतरंगी रंगों में
सज रही
ज़र्रा ज़र्रा खुशियां गम की परछाई
दिख रही
कई राहों से गुजर कर मौत के आगोश
में पल रही
जिंदगी ऐसे चल रही जैसे शमा
जल रही