विफल मन शापित जीवन
क्या पूर्ण कर पायेगा किसी का रिक्त पन।
बोझ हुआ जाता जीवन
संवरण करता गया वरण।
ना थमा दौर सुमधुर स्मृति का
ना मुक्ति मिली दुविधा
के झंझटों से।
नियति निष्ठुर खेलती रही
दांव मेरे जीवन का अपने पासों से।
हँसी और आंसू के
मिश्रित गीत गाती रही।
ओझल रहे नयनों से तो क्या
अनुभूत संग तेरा पाती रही।
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