प्रलय सूक्ति: महाभय और प्रलय का काव्य

प्रलय सूक्ति

जब भय में व्याप्त होगा संसार
और नहीं होगा उद्धार
जब रचनाएँ देवताओं की मिटेंगी
और चिताएँ मनुष्यों की उठेंगी

तब प्रलय होगा महाभयंकर
कांपेगा हर पत्थर-पत्थर,
होगा मृत्यु का आगमन
और जीवन का गबन
तब कोई खड़ा न रह पाएगा
मन खण्ड-खण्ड हो जाएगा।

सूर्य लालिमा, चन्द्र चाँदनी
जब अपनी खो देंगे
धरती नदियाँ, समुद्र और पर्वत
स्वतः ही रो देंगे।

पीड़ीत होगे मन
श्रव्यं होगा अंतर्रोंदन
पृथ्वी का हृदय फटेगा
और उजाला शीघ्र घटेगा।

हाहाकार होगी सब ओर
नहीं बचेगा कोई छोर
धरा नष्ट हो जाएगी
कंठो से सिर्फ चीखें आएगी
अंतरतम् में होगा व्याप्त
भय, क्षुब्धता, अंधविश्वास।

– अंशुमान सिंह ठाकुर