यह कविता “काश, ऐसी होली अबके बरस आयें” की भावभूमि पर अहंकार, ईर्ष्या और बैर को मिटाकर प्रेम, करुणा, भक्ति तथा नारी सुरक्षा व प्रकृति की खुशहाली की कामना करती है।
बेटे की सड़क दुर्घटना के बाद बेनीप्रसाद जी और उनका परिवार पाँच वर्षों तक होली नहीं मनाते। बहू का प्रेम और त्यौहार की उमंग उन्हें आगे बढ़ने का साहस देती है, और आज रात वे आरती के बाद नई शुरुआत का संकल्प लेते हैं।
दिनेश और सुनीता के बीच दूरियाँ, यादें और नाराज़गी होली के रंगों में घुल जाती हैं। छुट्टी के दिन की प्रतीक्षा से शुरू होकर घर लौटने तक की भावनात्मक कहानी—“होली का उपहार”।