कविता: शांत रस में मुरलीधर कान्हा की आराधना

कविता🌹🌹🙏
रस__शांत रस

हे मुरलीधर मोरे कान्हा
मैं नित तोरा ध्यान धरुं
हर दिन तोहरी राह निहारुं
अब पधारो मोरे द्वार प्रभु

ना करती मैं कोई शिकायत
ना कुछ तुझसे मांगती
मैं देखूं जैसे तुझको
तू भी कभी देखें मुझकों

हर दर्द सहा, अपमान सहा
जीवन जैसे बना परीक्षालय
विश्वास की डोर ना छोड़ी मैंने
निसदिन तुझको ही पुकारा
तेरी ही प्रतीक्षा की

मुस्कुराता ये तेरा प्यारा मुखड़ा
इसे निहारत मैं हर्षाती
तूने बहुत ही नाच नचाए
महसूस तू होता आसपास कहीं

फिर भी जाने क्यों
तेरे दरश को हरक्षण तरसे नयन
बहुत मनाया तोहे मेरे गिरधर
बहुत ठीट पर तू ना आया

मोरी आखरी अरज,सुनो गिरधारी
जब अंत निकट आये मोरा
तू अपना रुप दिखा देना
ना करना कोई देर प्रभु
दासी का मान तू रख लेना

मुरली की तान छेड़ना ऐसे
भवसागर से पार कर देना
अपने धाम की चरण धूली बना
चरणों में स्थान तू दे देना

स्वरचित
जयन्ती अखिलेश चतुर्वेदी