मैं नारी नदी सी निर्झर बहती हूँ ,
अपने पथ चलती गिरती बढ़ती जाती हूँ ।
जीवन पथ पर आगे बढ़ती कई बार रोकी जाती हूँ ,
कई बाधाओं को पार कर सुख देती रहती हूँ ।
ना जाने कितने अरमानों का गला घोंट सबके अरमान सजाती हूँ ,
कभी सुखी नदियां सी कभी उफनती धारा बन परिवार अपना सींचती हूँ ।
मैं नारी निश्चल निर्झर औरों के सुख दुख जीती अपना भूल जाती हूँ ,
मायके की गली छोड़ ससुराल में डोर प्रीत सजाती हूँ ।
दो परिवारों को साथ लेकर कर्तव्य पथ पर बढ़ती जाती हूँ ,
नारी जीवन भर पराई बन सबको अपना बनाती हूँ ।
दो कुल जोड़े रखने की सच्ची प्रीत निभाती हूँ ,
तभी तो मैं नारी सीता सावित्री अन्न पूर्णा दुर्गा लक्ष्मी कहलाती हूँ ।