यह कविता बेटी से माँ तक के सफ़र में निभाई गई भूमिकाओं की बात करती है और सवाल उठाती है कि अपनों के लिए लड़ने वाली स्त्री अपने मान और स्वाभिमान के लिए क्यूँ चुप रह जाती है।
इस कविता में स्वाभिमान बनाए रखने, झूठ के जंजाल से बचने, विपत्तियों का सामना करने और नेक राह पर कदम बढ़ाने की सीख दी गई है। साथ ही गीता और क़ुरान को कोसोने से बचने तथा हिंदुस्तान को आपसी नफ़रत से न बांटने का संदेश भी है।