राधेश्याम बाबू का परिवार और दान की सीख

राधेश्याम बाबू का परिवार और दान की सीख

दिन भर की थकान के बाद रात्रि को राधेश्याम बाबू की कार गांव के लिए रवाना हुई, आज वे पत्नी, बड़े बेटे व बेटी के साथ सुबह से शहर आये थे। बड़े बेटे के कालेज एडमिशन व साथ ही गुड़िया की नई नई ड्रेसों की खरीदी का आनंद था।

सरीता- सुनो जी अब समय अधिक हो गया है, घर पहुंचते पहुंचते देर हो जायेगी, क्यों न रास्ते में किसी रेस्टोरेंट में खाना खा ले।

गुड़ीया – हां पापा मुझे भी पालक-पनीर की सब्जी व तंदूरी रोटी खाना है।

समीर- मुझे भी दाल फ्राई खाना है।

रामेश्वर बाबू- ठीक है किसी अच्छे रेस्टोरेंट पर कार रोक लेता हूँ।

हायवे पर अच्छा रेस्टोरेंट देख कर सभी ने अपना मन पसंद भोजन किया व बाहर निकले। कार पार्किंग से बाहर निकाली तो वहां खड़े चोकिदार जिसने आये तब भी कार लगवायी थी, रामेश्वर बाबू को नमस्कार किया, उन्होंने दस रुपए का नोट निकाल कर उसे दिया, उसने कहा भगवान आपके परिवार को खुश रखे।

कार में बैठते हुए गुड़िया बोली, “मम्मी उसने तो कुछ नहीं किया व वैसे भी रेस्टोरेंट का मालिक उसे इस काम वेतन देता होगा फिर पापा ने उसे पैसे क्यों दिये?”

सरीता- बेटा उनकी उम्र 70-75 वर्ष होगी, वह इस उम्र में भी काम कर रहे हैं व उन्हें इस कार्य के लिए खूब से खूब एक हजार या पंद्रह सो रुपए मिलते होंगे।

“यदि भगवान ने हमें इस योग्य बनाया है कि हम किसी की मदद कर सके तो हमें ऐसे काम करने वालों की मदद करना चाहिए जो काम कर कुछ उम्मीद रखते हैं, भीख नहीं मांग रहे हैं।”

रामेश्वर बाबू- बेटा पांच दस लोगों ने भी इस प्रकार मदद की तो उसके परिवार की थोड़ी मदद हो जायेगी, दस रुपए में हम गरीब नहीं हो जाएंगे और वह कहीं अमीर नहीं हो जायेगा।

गुड़िया मम्मी- पापा के जवाब संतुष्ट थी व आदतन गाने सुनने लगी।