पटेल दादा की कोरोना-भागदौड़: एम्बुलेंस वाला किस्सा

बहार के मौसम की तरह फैले कॅरोना के डर, पहले लक्षणों से लेकर फिर सावधानी और एम्बुलेंस की नौबत तक—एक परिवार की हास्य-व्यंग्य भरी कहानी।

कब सोचा जिंदगी इतनी थम जायेगी — कोरोना पर कविता

कोरोना के कारण बदली हुई जिंदगी, घर-परिवार तक सीमित दिनचर्या, और इस कठिन समय में आशा की सीख—यह कविता उन्हीं भावों को शब्द देती है।

कोरोना के बाद शहर में संघर्ष और गांव लौटने का फैसला

शहर में रोजगार के लिए आए सपने, कोरोना महामारी के कारण टूटते हैं। बचत खत्म होने का डर और बढ़ते संक्रमण के बीच एक बातचीत में अंततः गांव लौटकर खेती करने का निश्चय होता है।

बेटी तुम डरो ना: कोरोना के खिलाफ हिम्मत की कविता

यह कविता बेटी को डरने से मना करती है और कोरोना जैसी वैश्विक चुनौती के बीच स्वच्छता, दूरी, शांति और सहयोग के साथ हिम्मत बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

शादी का निमंत्रण: कोरोना के दौर की बहस

शादी के निमंत्रण पर शर्मा जी और विनिता की टकराव भरी बातचीत, महामारी के समय शादी में जाने से इनकार, और अंत में आती कोरोना से जुड़ी चौंकाने वाली खबर—यह सब एक पारिवारिक बहस के रूप में सामने आता है।