एक शिकारी रात में एक झोपड़ी के पास पहुंचता है। बुढ़िया के पास खाना न होने पर भी वह पानी और दाल-चावल जैसी चीजें जुटाकर शिकारी के साथ मिलकर कुल्हाड़ी के शोरबा वाली बढ़िया खिचड़ी बनवाती है।
भोली कुहू माँ के आँचल की तलाश में बड़े संघर्षों से गुजरती है, और सौतेली माँ रूपा के कठोर व्यवहार के बाद प्रेम, पश्चाताप और माफी के जरिए सच्ची ममता का रूप सामने आता है।
एक माँ अपने बेटे की अधिकारी बनने की खुशी में मिठाई बनाती है, समय के साथ जीवन में सुकून आता है, फिर अचानक बीमारी, लाखों खर्च, और कोमा के बाद बेटे की मौत—जिसमें भ्रष्टाचार/धोखे की आशंका भी उठती है।
भावेश घर में भावनाओं को दबाकर आता है और निगम अंकल के साथ हुई बातचीत के दौरान विभूति के नए पद पर प्रमोशन की खुशी सामने आती है। इस बीच विभूति ऑफिस से छुट्टी लेने की सोचती है, और दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्करा देते हैं।
शादी के निमंत्रण पर शर्मा जी और विनिता की टकराव भरी बातचीत, महामारी के समय शादी में जाने से इनकार, और अंत में आती कोरोना से जुड़ी चौंकाने वाली खबर—यह सब एक पारिवारिक बहस के रूप में सामने आता है।
बेला की बेटी राशि के ऑनलाइन बैंक इंटरव्यू में सफलता के बाद होने वाली ट्रेनिंग और ब्रांच चयन की उलझन के बीच माँ-बेटी का भावनात्मक संवाद उभरता है, जहां राशि अपनी आत्मनिर्भरता और भविष्य के भरोसे की बात करती है।
बालू और रेवती का बचपन साथ-साथ, फिर हालातों के कारण बिछड़ना, पैसा जुटाने का संघर्ष, और अंततः एक स्कूल में एडमिशन दिलाने के जरिये उनके प्रेम और कृतज्ञता की भावपूर्ण परिणति—“प्रेम की पराकाष्ठा”।
पवित्र नगरी की नाव-यात्रा के दौरान नन्हे शिशु के रोने और दूध खराब होने की परेशानी में मानसी युवती की सूझबूझ से सहायता करती है। समय पर समस्या का समाधान होता है और सभी राहत महसूस करते हैं।
रश्मि के पति रोहन की किडनियां खराब हो जाती हैं और तत्काल ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है। परिवार की चिंता के बीच रश्मि का दृढ़ निश्चय उसे अपनी एक किडनी पति को देने तक ले जाता है—और आखिरकार दोनों जीवन की उम्मीद के साथ आगे बढ़ते हैं।