इस निबंध में लेखक ने अपने गाँव की मिट्टी की खुशबू, खेतों की हरियाली, संयुक्त परिवार की आत्मीयता और चौक में खड़े बुढ़ा बरगद के पेड़ की यादों, छाया और पीढ़ियों से जुड़ी भूमिका को भावपूर्ण ढंग से रेखांकित किया है। अंत में बुढ़ा बरगद को समर्पित एक छोटी कविता भी है।
एक माँ अपने बेटे की अधिकारी बनने की खुशी में मिठाई बनाती है, समय के साथ जीवन में सुकून आता है, फिर अचानक बीमारी, लाखों खर्च, और कोमा के बाद बेटे की मौत—जिसमें भ्रष्टाचार/धोखे की आशंका भी उठती है।
यह कविता नारी के दो रूपों—मायका और ससुराल—को दो नदी की धाराओं की तरह चित्रित करती है, जहाँ परिवार के रिश्ते, अपनत्व, ममता और सम्मान मिलकर नारी को सागर-सी गहराई देते हैं।
इस कविता में समय के सरकने, आत्मविश्वास और संबंधों की निभाई जाने वाली मजबूरियों, तथा मन के टूटने-फिर जुड़ने की भावनात्मक यात्रा को शब्दों में पिरोया गया है।
एक शिकारी रात में एक झोपड़ी के पास पहुंचता है। बुढ़िया के पास खाना न होने पर भी वह पानी और दाल-चावल जैसी चीजें जुटाकर शिकारी के साथ मिलकर कुल्हाड़ी के शोरबा वाली बढ़िया खिचड़ी बनवाती है।
शुभि अपने घर की बदली हुई खुशियों को याद करती है और देखती है कि उसका रिश्ता रोज़-रोज़ हिंसा और शक में बदलता जा रहा है। जब प्रशांत बच्चों तक पर हाथ उठाता है, तो शुभि टूट जाती है और एक निर्णायक कदम सोचने पर मजबूर हो जाती है।