कविता: शांत रस में मुरलीधर कान्हा की आराधना

यह कविता “शांत रस” में मुरलीधर कान्हा/गिरधारी के प्रति समर्पण, प्रतीक्षा, विश्वास और अंतिम क्षण की विनती व्यक्त करती है।

मेरे गाँव का वो बुढा बरगद: प्रेम, रिश्ते और बुढ़ापे की विरासत

इस निबंध में लेखक ने अपने गाँव की मिट्टी की खुशबू, खेतों की हरियाली, संयुक्त परिवार की आत्मीयता और चौक में खड़े बुढ़ा बरगद के पेड़ की यादों, छाया और पीढ़ियों से जुड़ी भूमिका को भावपूर्ण ढंग से रेखांकित किया है। अंत में बुढ़ा बरगद को समर्पित एक छोटी कविता भी है।

एक माँ की उम्मीद और बेटे की त्रासदी

एक माँ अपने बेटे की अधिकारी बनने की खुशी में मिठाई बनाती है, समय के साथ जीवन में सुकून आता है, फिर अचानक बीमारी, लाखों खर्च, और कोमा के बाद बेटे की मौत—जिसमें भ्रष्टाचार/धोखे की आशंका भी उठती है।

विधाता की लीला अपरंपार है – कविता

विधाता की लीला अपरंपार—कहीं खुशियां, कहीं गम; कहीं अंधकार, कहीं सूर्य की रोशनी; झूठ-फरेबी और इमानदारी; बारिश-सूखा—अद्भुत संसार पर यह कविता है।

बेटी तुम डरो ना: कोरोना के खिलाफ हिम्मत की कविता

यह कविता बेटी को डरने से मना करती है और कोरोना जैसी वैश्विक चुनौती के बीच स्वच्छता, दूरी, शांति और सहयोग के साथ हिम्मत बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

नारी: दो नदियाँ—मायका और ससुराल का किस्सा (राजश्री सिकरवार)

यह कविता नारी के दो रूपों—मायका और ससुराल—को दो नदी की धाराओं की तरह चित्रित करती है, जहाँ परिवार के रिश्ते, अपनत्व, ममता और सम्मान मिलकर नारी को सागर-सी गहराई देते हैं।

जीवन और मन की बेपरवाही: एक कविता

इस कविता में समय के सरकने, आत्मविश्वास और संबंधों की निभाई जाने वाली मजबूरियों, तथा मन के टूटने-फिर जुड़ने की भावनात्मक यात्रा को शब्दों में पिरोया गया है।

माँ की सूरत: भावपूर्ण कविता

“साँवली सलोनी…” कविता में माँ के रूप, प्रेम, आशीर्वाद और माँ के बिछुड़ने के बाद घर-आँगन की वीरानी को भावुक शब्दों में पिरोया गया है।

कंजूस बुढ़िया और शिकारी की खिचड़ी की कहानी

एक शिकारी रात में एक झोपड़ी के पास पहुंचता है। बुढ़िया के पास खाना न होने पर भी वह पानी और दाल-चावल जैसी चीजें जुटाकर शिकारी के साथ मिलकर कुल्हाड़ी के शोरबा वाली बढ़िया खिचड़ी बनवाती है।

घरेलू हिंसा की हद: शुभि का निर्णय

शुभि अपने घर की बदली हुई खुशियों को याद करती है और देखती है कि उसका रिश्ता रोज़-रोज़ हिंसा और शक में बदलता जा रहा है। जब प्रशांत बच्चों तक पर हाथ उठाता है, तो शुभि टूट जाती है और एक निर्णायक कदम सोचने पर मजबूर हो जाती है।